एक नजर

Sunday, 29 November 2020

आपसी द्धेष के निपटारे हेतु जनसँख्या के अनुपात में आरक्षण का वितरण एकमात्र विकल्प ||Reservation in India in hindi

अभी हाल में आए कॉलेज व्याख्याता  पर राजस्थान हाई कोर्ट के निर्णय ने युवा मे सनसनी मचा दी  | कॉलेज व्याख्याता में आरक्षण के मसले पर अपना निर्णय सुनाते हुए , जज एस . पी .  शर्मा  की बैच ने कहा कि " आरक्षित वर्ग की  कट आफ  से उत्तीण हुए अभ्यर्थी सामान्य वर्ग पद के दावेदार नही होगे | इस विषय पर बैच के द्वारा जो तर्क प्रस्तुत किये गए वो भी बिलकुल चौकाने वाले थे | इस बैच ने कहा कि यदि  किसी अभ्यर्थी  ने किसी  भी  प्रकार  से आरक्षण का लाभ लिया  ( नेट/ स्लेट ) है , तो  इस पद के दावेदार नही बन सकते है |यह कोई नई बात नही इसके पूर्व भी भारत में ओवेर्लापिंग पर बहस होते रहे है |




किन्तु  मै आपका ध्यान इसके बजाए  कई दशको से आरक्षण का मसले  पर  विभिन्न समुदायों के बीच द्वेष और विवादों को ओर केन्द्रित करना चाहूँगा जिसकी वजह से आए दिन बच्चों  को मानसिक प्रताड़ना का सामना करना  पड़ता है | ऐसे  में आपसी  द्धेष  की बढने की अत्यधिक संभावनाए इसलिए  महामहिम एवं भारत की न्याय व्यवस्था को  इस  विषय पर विचार करना चाहिए ऐसा नही है कि इसके पूर्व इसके पर विचार नही हुए , समय समय पर भारत की सर्वोच्च न्याय व्यवस्था एवं माननीय उच्च न्यायालय के द्वारा इस विषय में हस्तक्षेप किये जाते रहे है | इस लिए यह जरुरी आन पड़ी है  कि अब इसके लिए मध्य मार्ग का चयन  किया जाए |       

 


जनसख्या के अनुपात में आरक्षण का वितरण एक मात्र विकल्प  - 

भारतीय समाज जाति व्यवस्था पर आधारित समाज है | कहते है जाति जो कभी नही जाती |ऐसे में भारत की सर्वोच्च न्याय व्यवस्था एवं भारत के माननीय उच्च न्यायालय को इस पर विचार करने की  जरूरत  है और जब आरक्षण  का  मसला हो तो और भी बन जाता है | इस आरक्षणवादी व्यवस्था ने समाज में द्धेष को जन्म दिया है | इसलिए यह आवश्यक है कि आरक्षण के वितरण के मसले पर  विचार  करते हुए | समाज में इसका  इस प्रकार वितरण किया जाए कि आपसी द्धेष भी न रहे और भाई चारा भी बना रहे  | भारतीय समाज में  सवर्ण समुदाय कुल  आबादी के लगभग  15 %  है | इसी बात को आधार मानकर अथवा बनाकर भारत की सर्वोच्च न्याय व्यवस्था को  सवर्ण समुदाय के वर्ग के लोगो के लिए  15 % सीटो को आरक्षित कर  देना  चाहिए |बाकी जो जितनी सीटें बचती है |  उनका भी जनसंख्या के अनुपात में वितरित किया जाना  चाहिए | ऐसे में आरक्षण का समान रूप में वितरण  होना भी सम्भव हो सकेगा  | तथापि  नैतिक मूल्य भी बने रहेगे , जो वर्तमान समय में पुरानी व्यवस्था प्रचलित है उदाहरणार्थ -  50 % सीट आरक्षित और 50 % सीट अनारक्षित में , जो विभाजित थी उसे समाप्त कर | उसके स्थान पर जनसँख्या के अनुपात में बाँट दिया जाना चाहिए  ताकि एक स्वस्थ एवं समृद्ध भारत का निर्माण हो सके और देश की अखंडता एवं बंधुता भी बनी रहे |

 लेखक : शिव कुमार खरवार 

No comments:

Post a comment