एक नजर

Wednesday, 26 February 2020

भारतीय संविधान धर्म के आधार पर भेदभाव की अनुमति नही देता || Secularism in hindi

Secularism in hindi  : (Secularism in India in hindi) भारतीय संविधान धर्म के आधार पर भेदभाव की अनुमति नही देता

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 Secularism in hindi


भारतीय संविधान में निहित है धर्मनिरपेक्ष ( Secularism in hindi ) का भाव  ,जो राज्य को धर्म के आधार पर बाटने का अधिकार नही देता वैसे तो हम सदैव से धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र/राज्य रहे है |
जैसा की डॉ भीम राव अम्बेडकर ने कहा था कि भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़ने की क्या आवश्कता है | वही आरएसएस के सरसंचालक गोलवलकर ने कहा था की हम हजारो सालो से ही धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र रहे है यह वह धरा है जहाँ सदियों से विभिन्न मत मतान्तर के मानने वालों लोगो ने निवास किया ऐसे में धर्मनिरपेक्ष शब्द को भारतीय संविधान में जोड़ने का औचित्य है इसके स्थान में बहुधार्मिक के रूप में वर्णित करना उपयुक्त होगा 
बाद के वर्षो में सन १९७६ स्वर्ण सिंह समिति रिपोर्ट के आधार पर  ४४ सवैधानिक संशोधन के द्वारा भारतीय संविधान में सेक्युलर (धर्मनिरपेक्ष ) शब्द जोड़ा गया |

धर्मनिरपेक्षता का अर्थ  ( what  is secularism  ) -

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जिसका सामान्य सा अर्थ है की राज्य का अपना कोई एक धर्म/पंथ नही होगा इसका मतलब यह हुआ कि  राज्य धार्मिक आधार पर  बाटने  की नीति नही अपनाएगा और  न ही वह धर्म के आधार पर देश के किसी भी नागरिक साथ किसी प्रकार का भेदभाव करेगा यू कहे की राज्य के लिए सभी धर्म समान होगे |

क्या कहता है भारतीय संविधान  -

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भारतीय संविधान के अनु ० १५ कहता है की राज्य देश के किसी भी नागरिक के साथ धर्म ,वंश (प्रजातीय )  ,  जाति  , लिंग ,जन्मस्थान इसमें से किसी के एक के आधार पर भेदभाव नही करेगा |तथा भारतीय संविधान के अनु ० २५  में यह उल्लेख कर किया गया की प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी धर्म को मानने  , आचरण करने तथा प्रचार करने का अधिकार देता है | ऐसे में देश के अन्दर जो हालात उत्पन्न हो रहे उनको देखकर यह कहना गलत नही होगा कि  

गांधी की हत्या के मामले में नाथूराम गोडसे जो की आरएसएस के सदस्य होने के बारे में  जानकारी न मिलने के कारण तथा गोपाल गोडसे के क़बूलनामे से काफ़ी पहले जुलाई, 1949 में सरकार ने साक्ष्यों के अभाव में आरएसएस पर लगाए गए प्रतिबंध हटा दिए किन्तु ऐसा करने से पहले सरदार पटेल के कठोर दबाव में आरएसएस ने अपने लिए एक संविधान का निर्माण किया जिसमें यह स्पष्ट तौर से लिखा गया था कि ‘‘आरएसएस पूरी तरह से सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रति समर्पित रहेगा’’ और किसी तरह की राजनीति मे शामिल नहीं होगा.चार महीने बाद, जबकि संविधान की प्रारूप समिति ने संविधान लिखने की प्रक्रिया पूर्ण कर ली थी, आरएसएस ने अपने मुखपत्र द ऑर्गेनाइजर में 30 नवंबर, 1949 को छपे एक लेख में संविधान के एक अनुच्छेद को लेकर अपना विरोध प्रकट किया यहां आरएसएस संविधान की तुलना में मनुस्मृति को श्रेष्ठ बताकर, शायद अपनी या कम से अपने नेताओं की प्रतिक्रियावादी मानसिकता को समझने का मौक़ा दे रहा था. वह उसी मनुस्मृति जो कि एक क़ानूनी संहिता है, को इतना महान दर्जा दे रहा था जिसके मुताबिक, ‘‘शूद्रों के लिए ब्राह्मणों की सेवा से बढ़कर कोई और दूसरा रोज़गार नहीं है; इसके अलावा वह चाहे जो काम कर ले, उसका उसे कोई फल नहीं मिलेगा’’; यह वही शोषणपरक मनुस्मृति है, जो शूद्रों को धन कमाने से रोकती है- ‘‘वह भले सक्षम हो, लेकिन धन संग्रह करनेवाला शूद्र ब्राह्मणों को कष्ट पहुंचाता है’’.भारत की आज़ादी के उपलक्ष्य में आरएसएस के मुखपत्र ‘द ऑर्गेनाइजर’ में प्रकाशित संपादकीय में संघ ने भारत के तिरंगे झंडे का विरोध किया था, और यह घोषणा की थी कि ‘‘हिंदू इस झंडे को न कभी अपनाएंगे, न कभी इसका सम्मान करेंगे.’’ बात को स्पष्ट करते हुए संपादकीय में कहा गया कि ‘‘ ये ‘तीन’ शब्द ही अपने आप में अनिष्टकारी है और तीन रंगों वाला झंडा निश्चित तौर पर ख़राब मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालेगा और यह देश के लिए हानिकारक साबित होगा.’’
                                                         द वायर में छपे एक लेख क्या संघ भारत छोड़ो आन्दोलन के खिलाफ 

फासीवाद के जकड़ में धसता जा रहा देश -

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देश को फासीवाद नामक बिमारी ने जकड़ लिया है जिसका सीधा असर कम उम्र  बच्चे और नव जवानो में देखा जा सकता है जिसने उनको  शैतान में तब्दील करने का कार्य किया है जिसके स्पष्ट उदाहरण के रूप में दिल्ली में घट रही घटनाओ को देख सकते है जहाँ बीते दिनों आपस में दो गुटों का टकराव इसके उज्लन्त उदाहरण है जिसकी स्पष्ट झलक धर्म नामक अफीम व सत्ता के मद में चूर राजनैतिक दल के प्रभाव के रूप में दिल्ली में घट रही घटनाओं के अवलोकन से लगाया जा सकता है | 
 जैसा की अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक पाकिस्तान पर विचार ( Thought on Pakistan ) में  ठीक ही कहा था की सावरकर का हिन्दू शब्द को परिभाषित करने के दो उद्देश्य थे पहला पवित्र भूमि का खाका घिच मुस्लिम , ईसाइयों , पारसियों और यहूदियों को इसमें शामिल न करना दूसरा वेदों की पवित्रता का स्वाग रच कर बौध्द , सिख , जैन धर्मो को अपने में शामिल करना जिसने हिन्दूधर्म  को अपने आप में एक राष्ट्र और मुस्लिम को एक पृथक राष्ट्र के रूप में निरुपित किया                                                       
क्या यह वही देश जिसने विश्व को अहिंसा की  सीख दि -
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क्या यह वही देश है जहाँ लोग को अहिंसा परमो धरम की सिख दी जाती है , क्या यह वही देश है जहाँ वसु देव कुटुम्बकम के नारे लगाये जाते है , क्या यह वही देश जिसने सर्व धर्म समभाव की सीख दी , क्या यह वही देश है जहाँ महात्मा बुध्द , गाँधी , अम्बेडकर जैसे शांति के अग्रदूत पैदा हुए और विश्व को अहिंसा का पाठ पढाया , क्या यह वही देश जिसने यह सिख दिया की अन्धकार से प्रकाश की ओर चलो |

 विवेकानंद ने ११ सितम्बर १८९३ के अपने  संयुक्त राज्य अमेरिका के शिकागो शहर में आयोजित धर्म संसद में कहा था : मुझे गर्व की मै उस धर्म का हूँ जिसने दुनिया का सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकार्यता दोनों सिखाई हम न सिर्फ सार्वभौमिक सहिष्णुता पर विश्वास करते है बल्कि सभी धर्मो के अस्तित्व को भी स्वीकार करते है |मुझे गर्व है मई ऐसे देश से हूँ जिसने सभी धर्मो और पृथ्वी के सभी राष्ट्रों के सताए हुए लोगो और शरणार्थीयो को आश्रय दिया भाईयो मई उस प्रार्थना की कुछ पंक्तियाँ आपके सामने कहना चाहूँगा जो मुझे याद है की मई बचपन में दोहराया करता था और जिसे लाखों मानव प्रतिदिन दोहराते है : जैसे अलग अलग जगहों के विभिन्न स्त्रोतों से निकली धाराये अपना जल सागर में मिला देती है , हे ईश्वर , वैसे ही अलग अलग प्रवृतियों के माध्यम से मनुष्य द्वारा अपनाए गए विभिन्न रास्ते ,चाहे वे टेढ़े मेढ़े हो या सीधे सभी आप तक ही पहुचते है |मौजूदा सम्मेलन , अपने आप में गीता में सिखाए गए इस बेहतरीन सिध्दांत की दुनियां के सामने घोषणा और पुष्टि करता हूँ : सभी मनुष्य उस पथ पर संघर्ष कर रहे है जो अंत में मुझ तक ही पहुचते है | साम्प्रदायिक , धर्मान्धता और इसकी भयानक वंशज कट्टरता ने लम्बे समय से इस धरती को हिंसा से भर दिया है , मानव के रक्त में भिगो दिया है , सभ्यताओं को नष्ट कर दिया है और समूचे राष्ट्र को नैराश्य से भर दिया है |अगर ये भयानक राक्षस न होते तो मानव समाज इससे भी अधिक उन्नत होता ,जितना की वो आज है |(द कम्प्लीट वर्क्स आफ स्वामी विवेकानंद , वाल्यूम १ , १९८९ : ३ -४ )



मुझे तो संदेह हो रहा है की इस देश को क्या हो गया धर्म के उन्माद और सत्ता के गुरुर ने देश को दोराहे पर ला खड़ा कर दिया है |शायद इसी बात को लेकर नेहरु चिंतित थे जो उन्होंने आरएसएस के कार्यों को लेकर ७ सितम्बर १९४७ को उन्होंने अपने मुख्यमत्री को लिखे पत्र में कहा : 


हमारे पास ऐसे ढेरों सुबूत है जो यह दर्शाते है की आरएसएस एक ऐसा संगठन है जो निजी सेना की प्रकृति का है और जो निश्चित रूप से कठोर नाजी रास्ते पर चल रहा है ,यहाँ तक की संगठन की तकनीकिय का भी अनुसरण कर रहा है हमारी इच्छा नागरिक स्वतंत्रता में दखल देने की नही है | लेकिन उपयोग करने के स्वाभाविक उदेश्य के साथ बड़ी संख्या में लोगो के सशस्त्र प्रशिक्षण को बढ़ावा नही दिया जा सकता है ...अत: प्रान्त की सरकार के लिए वांछनीय है की वः नजर बनाए रखे और आवश्कता पड़ने पर उचित कार्यवाही करे |( गुहा २०१० : ३३०-३१ )


धार्मिक उन्माद और सत्ता का गुरुर ने देश का बार बार छल्ली किया -

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जिस प्रकार सत्ता पर आसीन राजनीतिक दल और फुट डालो और राज करो की नीति लेकर चल रही उसको देखकर कुछ ऐसा लग रहा देश गत में समा जायेगा , जिसके आग में देश कई बार जल चूका है |
भारतीय विदेश सेवा के अधिकारीयों को १९५९ में अपने दिए गये उदबोधन में भारत को खतरा साम्यवाद से नही है , बल्कि हिन्दू दक्षिणपंथी साम्प्रदायिक से बताया |
                                                                        पंडित जवाहरलाल नेहरू 

गोलवलकर को सितंबर में आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने के कारणों को स्पष्ट करते हुए खत लिखा था. उन्होंने लिखा कि आरएसएस के भाषण ‘‘सांप्रदायिक उत्तेजना से भरे हुए होते हैं… देश को इस ज़हर का अंतिम नतीजा महात्मा गांधी की बेशक़ीमती ज़िंदगी की शहादत के तौर पर भुगतना पड़ा है. इस देश की सरकार और यहां के लोगों के मन में आरएसएस के प्रति रत्ती भर भी सहानुभूति नहीं बची है. हक़ीक़त यह है कि उसका विरोध बढ़ता गया. जब आरएसएस के लोगों ने गांधी जी की हत्या पर ख़ुशी का इज़हार किया और मिठाइयां बाटीं, तो यह विरोध और तेज़ हो गया. इन परिस्थितियों में सरकार के पास आरएसएस पर कार्रवाई करने के अलावा और कोई चारा नहीं था.’’

सरदार पटेल

18 जुलाई, 1948 को लिखे एक और खत में पटेल ने हिंदू महासभा के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी को कहा, ‘‘हमारी रिपोर्टों से यह बात पक्की होती है कि इन दोनों संस्थाओं (आरएसएस और हिंदू महासभा) ख़ासकर आरएसएस की गतिविधियों के नतीजे के तौर पर देश में एक ऐसे माहौल का निर्माण हुआ जिसमें इतना डरावना हादसा मुमकिन हो सका.’’ 
               सरदार पटेल

सन १९०९ , १९४७, १९९२ बाबरी मस्जिद ध्वंस , २००२ का गोधरा कांड और तत्कालीन समय में दिल्ली में सुलगती हुई आग को देखकर एक बात तो साफ़ हो गयी है की यह कोई एक या दो दिन पुरानी घटित होने वाली  कोई  घटना अथवा  साजिस नही अपितु इसकी जड़ो वर्षो से भारतीय आवाम को चूस रही है जिसके स्पष्ट झलक भले ही इन घटनाओ में दिखी हो परन्तु इसकी आधारशिला काफी पुरानी है सत्ता के मद जब जब कोई आता है तो उसका प्रभाव समाज में प्रतिलक्षित होता है लेकिन हो भी भूल जाता है की जैसा जब नाश मनुष्य का आता है तो पहले विवेक मर जाता है | जिसकी सीख रामायण में वर्णित घटनाओ से लेने की जरुरत अहम तो खैर रावण का भी न चला .....
                

निष्कर्ष :

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उपयुक्त विवरणों से यह बात भलिभांति स्पष्ट हो जाती है की धर्म व्यक्ति को पागल बना देता है |, जैसा की काल मार्स ने कहा था की धर्म वो अफीम है जिसका जितना सेवन करो वो उतना ही चढती है और सत्ता का गुरुर व्यक्ति को पागल बना देता है जैसा की कवी रामधारी जी ने अपने रचना रश्मिरथी में स्पष्ट किया है की जब नाश मनुष्य का आता है तो पहले विवेक मर जाता है |इसलिए यह जरुरी है की हम अपने भाई बहन को पहचाने जैसा की मोहनदास करम गाँधी ने हिन्दू और मुस्लिम प्रेम प्रतीक को स्पष्ट करने के लिए आँखों सहारा लिया और कहा कि  एक आंख के बिना शरीर अपंग हो जाता है, इसलिए जरुरत है की शांति और व्यवस्था को बनाये रखने में सहयोग करो , धर्म से उठकर देशहित , राष्ट्रहित के बारे में सोचे नही तो यह धर्म नामक बिमारी विकराल रूप ले कर सबको निगल जायेगी | जिसकी जद में पूरा देश जलेगा और हो सकता है की देश के अंदर ऐसा भी माहौल उत्पन्न हो जाय कि देश की आवाम या तो दंगाई पैदा हो या किसी दंगे की नेवाल चढ़ जाये |




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