Wednesday, 8 January 2020

“JNU जैसे शिक्षण संस्थानों से आखिर क्यों डरती है सरकार?”

शिक्षण संस्थानों से डरती है सरकार, क्योंकि वह जानती है कि उनके काले चिट्ठे यही खोल सकते हैं जैसा की हम लोग जानते है कि शिक्षा ही वह माध्यम या जरिया जिससे लोगो के अंदर चेतना या जनजागृति उत्पन्न होती है जो अधीनता से मुक्ति और बराबरी की बात को जन्म देती है जिसके विषय में ना जाने कितने महान आत्माओं ने अपने विचार दिए है जिसकी श्रृखला काफी लम्बी है जिसकी आधार शिला कही से शुरू हुई है। लेकिन जहाँ बराबरी , अधीनता से मुक्ति की बात आती है वहाँ एकलव्य , ज्योतिबा फुले , सावित्रीबाई बाई फुले , रमाबाई , भीमराव अम्बेडकर का नाम अग्रिण लिया जाता है जैसा की
डॉ ० भीमराव अम्बेडकर ने कहा था शिक्षा मानसिक संज्ञानात्मक विकास का एक ऐसा अस्त्र है जिसके द्वारा समाजिक गुलामी को मिटाया जा सकता है और आर्थिक व राजनैतिक मुक्ति को बढ़ाया जा सकता है जैसा की उनका मनना था की दलित व गरीब अशिक्षा के लिए जिम्मेदार नही है बल्कि सरकार जानबूझ कर शिक्षा के लाभ को सिमित कर इसे  कुछ  वर्ग विशेष के लोगो तक लाभ पहुँचाना चाहती है जिससे आम जनता उसका उसका लाभ न उठा सके |
वही ज्योतिराव बाई फुले का मानना था शुद्रो में अशिक्षा और सवर्णों की आर्थिक व सामाजिक स्थिति एक सोची समझी व सुनियोजित तरीके से कुछ खास वर्ग के लोगो के द्वारा सुनिश्चित की गयी है जिसकी गुलामी से मुक्ति व एक समतामूलक एवं न्याय पर आधारित संरचनात्समक समाज की स्थापना में शिक्षा की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
ऐसे में जबकी जेएनयू जैसे शिक्षण संस्थान जहाँ आधे से भी अधिक छात्र- छात्राए निम्न समुदाय अर्थात् दलित व गरीब तबके से आते हो और वे पढ़ लिख करगुलामी से मुक्ति व एक समतामूलक एवं न्याय पर आधारित संरचनात्समक समाज की स्थापना करने की बात करते है और सरकार की गलत नीतियों  पर प्रश्न उठाना शुरू कर देते है जिससे दलितों -वंचितों व देश का अहित हो रहा हो तो ऐसे में सरकार के आँखों में जेएनयू जैसे शिक्षण संस्थानो का खटकना स्वभाविक है।

क्या मुख्य मुद्दे से भटकाने में जुटी है सरकार

ऐसे में जब सरकार की सभी नीतियां विफल हो रही हैं, तो उन नीतियों से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए सरकार CAA, NPR एवं NRC लेकर आई। ज़ाहिर है कि अब लोगों का ध्यान बलात्कार, बेरोज़गारी, हत्या, दंगा, डकैती, जीडीपी दर में कमी, बढ़ते निजीकरण से लोक कल्याण को खतरा गरीबी ,भुखमरी असमानता और जातिवाद से हट जाएगा। अब लोगों का ध्यान हिन्दू-मुस्लिम पर ही केन्द्रित रहेगा, जिसका प्रमाण आज कल फेसबुक से लेकर व्हाट्सएप्प व तमाम सोशल मीडिया पर दिखाई दे रहा है। सोशल मीडिया पर वायरल कंटेंट का प्रयोग करके लोगों को भड़काने की कोशिश की जा रही है।

सोशल मीडिया के ज़रिये फैलाया जा रहा है प्रपंच

बांग्लादेश की लेखिका तसलीमा नसरीन की पुस्तक “लज्जा’’ में बांग्लादेश में घटित बलात्कार की घटनाओं का ज़िक्र है। इसमें मुस्लिम युवकों द्वारा हिन्दू महिलाओं व बच्चियों के रेप की घटनाओं पर बात की गई है जिसे सोशल मीडिया पर तेज़ी से प्रचारित कर उसे  सांप्रदायिक बनाने की कोशिश की जा रही है। इतिहास गवाह है कि जब जब देश के अंदर दंगे हुए, उसका फायदा हिंदुत्ववादी पार्टी भाजपा ने भरपूर उठाया।

क्या भारत सरकार के द्वारा लायी गयी नीति भारतीय संविधान की मूल भावना का उल्लघन कर रहा ?

आपको बता दे की नागरिकता संशोधन विधेयक भारतीय संविधान की मूल आत्मा अर्थात् अनु० १४ , व २५ का खुला उल्लघन करता है इसी बात को आधार बनाकर न्यायलयो में कई पिटिशन भी दाखिल किये गये है जिसकी सुनवाई फरवरी माह में तय की गयी है। CAA के मद्देनज़र होने वाले विरोध को ना केवल भारत में सराहा गया, बल्कि विश्व स्तर पर भी इसे समर्थन प्राप्त हुआ। जापान के प्रधानमंत्री ने भारत का दौरा कैंसिल कर दिया । भारत के ज़्यादातर नेताओं से लेकर लेखकों, पत्रकारों और अभिनेताओं ने इस बिल का घोर विरोध किया। लंदन स्थित ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया इत्यादि देशों में CAA की निंदा स्टूडेंट्स द्वारा खुलकर की गई।
भारत में लगभग सभी विश्वविद्यालयों ने इस बिल की निंदा की, जबकि भारत सरकार अपनी नीतियों को लेकर अडिग है। भारत के प्रधानमंत्री कहते हैं कि हमारी सरकार ने एक बार भी NRC का ज़िक्र नहीं किया है। सुप्रीम कोर्ट के कहने पर केवल असम के लिए कानून लाना पड़ा। प्रधानमंत्री जी ने तो यह तक कह दिया कि भारत में एक भी डिटेंशन सेंटर ही नहीं है। जबकि गृह मंत्री ने संसद में चीख चीखकर कहा कि हम पूरे देश के लिए NRC लाएंगे। खबर है कि सरकार ने CAA के समर्थन के लिए लोगों की राय जानने हेतु कोई नंबर जारी किया है, जिसके समर्थन में लोग से मिसकॉल के जरिये राय माग़े जा रहे है व्ह्गी दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर फ्री नेटफ्लिक्स , सेक्स , चैटिंग , सनी लेवोनी ,कालिंग आदि के माध्यम से लोग  CAA समर्थन में राय मांग जा रहे |

यही हाल रहा तो आने वाले जेनरेशन का होगा क्या?

अगर सरकार ऐसे ही हिन्दू-मुस्लिम करते लोगों पर आंखें मूंदती रही तो  निश्चित है कि हमारी आने वाली नस्लें या तो दंगाई पैदा होंगी या किसी दंगे का नेवला बन जाएगी। हम मूर्ति बने सब देखते रहेंगे।
आपको बता दें कि भारत विश्व में इंटरनेट बंद करने वाला अव्वल देश बन गया है जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हुई है। देश तेज़ी से तानाशाही की ओर बढ़ रहा है। आज भारत के प्रधानमंत्री की तुलना हिटलर से की जा रही है।
जिस प्रकार देश के विश्वविद्यालयों को छावनी में तब्दील कर दिया गया है, उससे लगता यही है कि अब लोकतंत्र खतरे में है। सत्तारूढ़ दल द्वारा उन लोगों को प्रमोट किया जा रहा है, जो हिंदुत्ववादी राष्ट्र बनाने के समर्थक हैं। सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ उठती आवाज़ों को दबाने के लिए विभिन्न प्रकार के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, जिसका एक बड़ा उदाहरण JNU में हुई हिंसा की वारदात है। इस तरह उच्च शिक्षण संस्थानों को कलंकित करने की कोशिश जारी है। आपको बता दें कि रविवार देर रात JNU स्टूडेंट्स द्वारा शांतिपूर्ण तरीके से फीसवृद्धि का विरोध किया जा रहा था, तभी नकाबपोश भीड़ कैंपस में घुसकर स्टूडेंट्स की पिटाई शुरू कर देती है। JNU छात्रसंघ अध्यक्ष आइशी घोष भी इस दौरान बुरी तरह से घायल हो जाती हैं, जिसके बाद लेफ्ट द्वारा यह कहा जाता है कि ABVP ने इस घटनाक्रम को अंजाम दिया है, तो वहीं ABVP यही आरोप लेफ्ट पर लगाती है। स्टूडेंट्स पर किया गया यह हमला मानवता को तार-तार कर रहा है। आज एक बार फिर ये अपने मंसूबे को अंजाम देने में भले गी जीत गए हों लेकिन आवाम जाग चुकी है और इसका जवाब ज़रूर देगी। लेखक - शिव कुमार खरवार 

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