Sunday, 3 November 2019

लैंगिक समानता : सिद्धांत और व्यवहार  || Gender In Hindi [Gender Equality ]

लैंगिक समानता : सिद्धांत और व्यवहार – 

लैंगिक समानता एकबेहद ही संवेदनशील और विचारणीय प्रश्न है जिसेलेकर समय-समयपरअनेक रूपों में विचार-विमर्श भी होते रहे हैं| सन 2018 में सोशल मीडिया पर एक विडिओ दिखायाजा रहा था जिसका शीर्षक था ‘Run Like A Girl’ अर्थात एक लड़की की तरह दौड़ो| जिसमे 16 से 28 साल तक के लड़को एवं लड़कियों से जब‘लड़कियों की तरह दौड़ने’ के लिए कहा गया तो लड़के और लड़कियां अपने हाथों और पैरों से कुछअजीब तरह के एक्सन करके दौड़ने लगे| उनकी इस क्रिया से एक बात निकलकर सामने आई कि उनके अनुसार ‘लड़कियों की तरह दौड़ने’का मतलब ‘कुछ अजीब तरीके से दौड़ना’ होता है| वहीँ एक पांच साल की बच्ची से पूछा गया कि अगरतुम्हें लड़कियों की तरह दौड़ने के लिए कहा जाय तो तुम कैसे दौड़ोगी तोबच्ची ने जवाब दिया ‘पुरे जोश और रफ़्तार के साथ’|
  इससे स्पष्ट होता है कि पांच साल की बच्ची के लिए ‘दौड़ने’ और लड़कियों की तरह दौड़ने’ में कोई अंतर नहीं है लेकिन एक वयस्क लड़के या लड़की के लिए दोनों में बहुत ज्यादा फर्क है| यहाँ दो बातें ध्यानदेने योग्य है पहला यह कि बात केवल महिलाओं के प्रति समाज के नजरिये की नहीं बल्कि खुद महिलाओं की स्वयं के प्रति उनके खुद के नजरिये की भी है, दूसरा यह कि यह नजरिया एक बच्ची में नहीं दिखता |
आज हम स्वयं को विश्व की अब तक की सबसे विकसित सभ्यता का दर्जा दने से परहेज नहीं करते लेकिनफिर भी जब इस तथाकथित विकसित सभ्यता में ‘लैंगिक समानता’ की बात आती है तो परिस्थितियाँ केवल भारत में ही नहीं वरन पुरे विश्व में बेहद निराशाजनक पायी जाती हैं क्योंकि आज भी महिलाओं को उनकी योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि उन्हें एक ‘महिला होने’ के आधार पर आंका जाता है| आज भी देखा जाय तो विश्व में कहीं भी उच्च पदों पर महिलाओं की भागीदारी बहुत ही कम सुनिश्चित हो पायी है और यह स्थिति केवल भारत की ही नहीं है वरन दुनिया के अधिकाँश देशों की है, स्वयं अमेरिका जो दुनिया का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र है और स्वयं को Equatable Society कहता है आज तक अपने लिए एक महिला राष्ट्रपति नहीं चुन पाया है |
बात केवल यहीं तक नहीं है वरन बात यह भी है कि जिन पदों पर महिलाओं की नियुक्ति हुयी भी है वहां भी उन्हें उसी काम के लिए पुरुषों से कम वेतन दिया जाता है| विश्व में महिलाओं की स्थिति से सम्बंधित एक रिपोर्ट बताती है कि ब्रिटेन जैसे विकसित देशों में भी कई ऐसी कम्पनियां हैं जहां महिला कर्मी को उसी के समक्ष पुरुष कर्मी से कम वेतन दिया जाता है|
  इस तरह पाते हैं कि इन तथाकथित उदारऔर आधुनिक देशों कीसोच केवल महिलाओं के खान-पान व कपड़े तक ही सिमित है, बात जब उनके आचरण की आती है तो इन तथाकथित उदार और आधुनिक देशों में लैंगिक असमानता व्याप्त होती है|
हमारे लिए यह एक गहन चिंतन का विषय होना चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों है? और जब हम इसके तह तक जाने का प्रयास करेंगे तो पायेंगे कि एक समाज के रूप में यह हमारी मानसिक स्थिति है जिसकी जड़ें काफी गहरी हैं| अपनीखोज में हम यह भी पायेंगे कि ‘इस सोच के बीज अपने बच्चों में न सिर्फ हम स्वयं डालते है वरन उन्हें लगातार पल्लवित और पोषित भी करते रहते हैं| बचपन से ही जब बच्चें कुछ समझने लग जाते है तो हम उन्हें कहानियां सुनाते हैं और जब बच्चा पढ़ने लायक हो जाता है तब हम उन्हें कहानियां पढ़ने के लिए देते हैं और शायद आपको यह जानकर आश्चर्य होगा किहम जाने- अनजाने में ही इन कहानियों के माध्यम से बच्चों के अन्दर इस मानसिकता के बीज डाल रहे होते हैं,जैसे एक सुन्दर और नाजुक सी राजकुमारी को राक्षस उठा ले जाता है जिसे एक वीर,साहसी और ताकतवर राजकुमार बचाकर वापस लाता है| हमारे बच्चों के मन में इस तरह की कहानियां किस मानसिकता के बीज बोते होंगे?..
 शायद अब हम यह समझ बनापा रहे होंगे कि एक पांच साल की बच्ची और एक वयस्क लड़के या लड़की की सोच के उस अंतर को हमारे ही द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से डाला जाता है जोकालांतर में हमारेसमाज में भी दिखाई देता है| एकसभ्य और विकसित समाज होने के नाते हमें यह समझना बेहद जरुरी है कि केवलपुरुषों को ही नहीं बल्कि स्वयं महिलाओंको भी अब स्वयं के प्रति अपने नजरिये को बदलना होगा| स्वयं को एक अबला न समझकर‘कुछ ख़ास’ समझनाहोगा|‘जो आप है जैसी आप है वैसे ही होना चाहिए’| अपने आत्मबल को निखारकर अपना सर्वश्रेष्ठ देना होगा और तब स्वयं के एक स्त्री होने पर गर्व के साथ जश्न मनाना होगा|’

 सादर:
राजू पटेल


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