Environmental pollution in hindi

वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय प्रदुषण || Environmental Pollution in hindi

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Environmental Pollution In Hindi

वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय प्रदुषण हिंदी में: एक झलक

पर्यावरण प्रदुषण आज एक गंभीर वैश्विक समस्या बनकर हमारे सामने मौजूद है| बढ़ती हुयी जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति तथा विकाश के नए आयाम हासिल करने के लिए आज जिस तरह से प्राकृतिक पर्यावरण का दोहन किया जा रहा है इसके परिणाम वास्तव में भयावह है|


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पर्यावरण का यह दुर्दोहन आज की घटना नहीं है वरन अगर हम आधुनिक विश्व की शुरुआत में इसकी जड़ खोजे तो पायेंगे यह प्रक्रिया तभी से काफी तीब्र रूप से चलती आ रही है| जिसे औद्योगीकरण और उसके बाद की घटनाओं ने और उंचाई पर पहुंचाने का काम किया| प्राकृतिक पर्यावरण के महत्त्व को हम अनेक देशों के प्राचीन ग्रंथों में भी देख सके हैं| इस मामले में भारत की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है| भारत में इनकी महत्ता को देखते हुए इनको पूजने का रिवाज रहा है|

भारत में पर्यावरण सरंक्षण

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विकिपीडिया पर पढ़े  - पर्यावरण सरंक्षण 

आधुनिक युग मे इस पर्यावरणीय विभीषिका को पहचानने का काम सर्वप्रथम महात्मा गाँधी ने किया| गांधी जी का कहना था ‘पृथ्वी पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों से व्यक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति तो की जा सकती है लेकिन उनकी  इच्छाओं की नहीं’|  अपनी पुस्तक यंग इण्डिया (1927) में दिए ‘आत्म संयम’(self control) के सिद्धांत में गांधी जी ने कहा कि ‘व्यक्ति को भौतिक साधनों का उतना ही प्रयोग करना चाहिए जितना उसके स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक हो’|

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गाँधी जी ने बढ़ते हुए आद्योगीकरण को इसी मानवीय इच्छा का परिणाम माना है| औद्योगीकरण से होने वाली इस पर्यावरणीय क्षति को महसुश कर महात्मा गांधी ने आद्योगीकरण का तीब्र विरोध किया| पर्यावरण के प्रति गांधी जी की इसी दूरदृष्टि को देखते हुए उन्हें ‘First Deep Ecologist’ की संज्ञा दी जाती है| पर्यावरणीय मुद्दों के प्रति भारतीय संविधान निर्माताओं ने भी गहरी संवेदनशीलता दिखाई है जिसका परिणाम हमें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48 के रूप में दिखाई देता है| आज दुनियाँ के देश आर्थिक क्षेत्र में नए कीर्तिमान हासिल करने के लिए पर्यावरण का मनमाना प्रयोग कर रहे हैं| विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार-‘ धरती का पर्यावरण नाशवान है और खुद को शुद्ध कर लेने की उसकी शक्ति को हम ठीक से समझ नहीं पाए हैं जो अपनी प्रकृति से सिमित है|’ बीसवीं शताब्दी से पूर्व लोगों के लिए पर्यावरणीय समस्या जैसी कोई चीज ही नहीं थी| बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पर्यावरण का मुद्दा समूचे विश्व जगत के लिए एक नये मुद्दे के रूप में सामने आया| लेकिन धीरे-धीरे पर्यावरण प्रदुषण ने एक बड़े वैश्विक समस्या का रूप धारण कर लिया, 

जल प्रदुषण  क्या है ?

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वायु प्रदुषण क्या है ?
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जिसका परिणाम यह हुआ कि विश्व स्तर पर पर्यावरण संरक्षण शिक्षा जैसे कार्यक्रम चलाने की आवश्यकता महशुस होने लगी|प्रकृति शिक्षा की कुछ झलक हमें 18वीं सदी के विद्वानों के विचारों में भी देखने को मिलता है| इनमे रूसो द्वारा लिखित पुस्तक EMILE या ON EDUCATION काफी महत्वपूर्ण है| रूसों ने ‘सामाजिक शिक्षा की बजाय प्रकृति की शिक्षा पर ज्यादा बल’ दिया है| रूसों का मानना था कि ‘आधुनिक सामाजिक शिक्षा ने मानव के चरित्र का नैतिक रूप से हनन किया है|’ रूसों के इन विचारों का एक समय सम्पूर्ण यूरोप में काफी तेजी से विस्तार हुआ, स्कूलों में ‘प्रकृति शिक्षा’ अनिवार्य कर दिया गया था| रूसों के इन्ही विचारों को आगे बढ़ाने का काम स्वीस विद्वान ‘लुईस अगसिज’ ने किया| अगसीज ने अपने छात्रों को ‘किताबों का नहीं वरन ‘प्रकृति’ का अध्ययन’ करने के लिए प्रेरित किया| इस तरह रूसों और अगसिंन ने सुदृढ़ पर्यावरणीय अध्ययन की नीव रखी| जो ‘प्रकृति के अध्ययन’ के नाम से भी जाना जाता है| प्रकृति का अध्ययन करने वाले इन छात्रों में प्रकृति की प्रसंशा व प्राकृतिक जगत के अंगीकरण की भावना विकसित करने के लिए पौराणिक कथाओं तथा नैतिक शिक्षा का सहारा लिया जाता था| प्रकृति अधययन में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली कार्नेल विश्वविद्यालय की प्रकृति अध्ययन की विभागाध्यक्ष A. B कौमस्ताक ने अपनी पुस्तक ‘Haindbook for nature study ( 1911) में सांस्कृतिक मान्यताओं के सम्बन्ध में बच्चों को शिक्षित करने के लिए ‘प्रकृति’ का उपयोग किया|

पर्यावरणवाद के आरंभिक संकेत EF शूमेकर की पुस्तक ‘Small is Beautiful’ में मिलते हैं| शूमेकर ने लिखा है कि ‘आधुनिक बौद्धिक समाज बौद्धिक दृष्टि से कितना ही परिष्कृत क्यों न हो, जिस नींव पर वह खड़ा है उसे ही खोखला कर रहा है| बहुत सारे ऐसे प्राकतिक संसाधन हैं जिनका पुनरुत्पादन नहीं किया जा सकता है| इस तरह इंसान अपनी कब्र स्वयं खोद रहा है|’सर्वेक्षण बताते हैं कि 1950 के बाद 50% से अधिक वनों का धरती से विनाश हो चुका है साथ ही साथ हजारों पेड-पौधों और जीव-जंतुओं की प्रजातियाँ भी विलुप्त हो चुकी हैं तथा कुछ विलुप्त होने के कगार पर हैं|


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ओवन ग्रीन के अनुसार ‘अन्तराष्ट्रीय राजनीति में पर्यावरण के मुद्दे उन्नीसवीं शताब्दी में ‘स्रोतों के प्रबंधन’ के सम्बन्ध में उभरे, उदाहरण के लिए राइन डेब्यू नदी पर नदी आयोग बनाया गया जो अपने आप में पर्यावरण का एक गंभीर एग्रीमेंट था| सन 1889 में बर्न में फ्लोरा पर पहली अन्तराष्ट्रीय संधि हुयी, जो फिलोरेजा नामक बीमारी को रोकने से सम्बंधित थी जिससे यूरोपियन अंगूर के खेती के नष्ट होने की संभावना थी, इसके बाद 1920 से 1950 तक फ्लोरा पर वैश्विक व क्षेत्रीय संधियों की झड़ी सी लग गयी जो ज्यादातर पेड़-पौधों की फसलों के रखरखाव व सरक्षण से सम्बंधित थी| इसी तरह फ्युना पर पहली संधि 1902 में कृषि हेतु महत्पूर्ण पक्षियों के संरक्षण के लिए की गयी | सन 1919 में फर सील मछली के संरक्षण हेतु अमेरिका, कनाडा व रूस के बीच संधि हुयी| सन 1945 में स्थापित ‘संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन’ का एक उद्देश्य UN द्वारा अपने संरक्षित प्रदेशों में पर्यावरण का संरक्षण भी था| वन्य जीवन उद्यानों के लिए पहला अन्तराष्ट्रीय प्रयास सन 1990 से शुरू किया गया|
1920 व 1930 के दशक के दौरान ‘ग्रेट डिप्रेशन व डस्ट बाउल’ के परिणामस्वरूप एक नए प्रकार की पर्यावरणीय शिक्षा व संरक्षण शिक्षा का उद्भव हुआ| कंजर्वेशन अध्ययन, प्रकृति अध्ययन की तुलना में अत्यंत भिन्न तरीके से प्राकृतिक संसार को संबोधित करता है,क्योंकि यह स्वाभाविक इतिहास के स्थान पर कठोर वैज्ञानिक परिक्षण पर आधारित है| संरक्षण शिक्षा इस काल की सामाजिक, आर्थिक व पर्यावरण  प्रदुषण के समाधान में सहयोग करता है|
आज पर्यावरणवाद एक विचारधारात्मक आन्दोलन बन चुका है,जो पश्चिमी राजनीति में 1970 के दशक में उभरा और धीरे-धीरे पुरे विश्व जगत में फ़ैल गया| वातावरण से घनिष्ट सम्बन्ध रखने वाले पर्यावरणविदों को परिस्थितिविज्ञानवादी (ecoligists) कहा जाने लगा| इसी से प्रेरित होकर राजनीति को ‘हरित राजनीति (Green Politics) कहा जाने लगा क्योंकि इस आन्दोलन के द्वारा हरियाली बनाए रखने पर बल दिया गया| पर्यावरण का एक सैद्धांतिक आधार ‘सामाजिक न्याय (social justice)’ है| इस सिद्धांत के पैरोकारों का मानना है कि ‘भूसंपत्ति किसी की निजी संपत्ति (Privet Property) नहीं है, यह हमारे पूर्वजों से हमें उत्तराधिकार में नहीं मिला है वरन हमारे हाथों में भावी पीढ़ी की धरोहर है|’ अतः इसको सुरक्षित रखने का दाइत्व हमारे कंधे पर है, ‘वर्त्तमान पीढ़ी को यह अधिकार नहीं कि वह मौजूद संसाधनों का पूर्ण दोहन कर भावी पीढ़ियों का गला घोटे
                         आधुनिक पर्यावरणीय शिक्षा जिसने 1960 के अंत तथा 1970 के प्रारम्भिक दशक में वेग प्राप्त की, यह प्रकृति अध्ययन व संरक्षण शिक्षा से निकला है| 1960 के दशक में प्रदुषण व पर्यावरण के संरक्षण हेतु अन्तराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक प्रयास शुरू हुये| यह प्रयास मुख्यतः विकसित देशों की ओर से किया गया| रीसेल कासरन ने 1962 में अपनी पुस्तक Silent Spring’ में DDT व अन्य कीटनाशक दवाओं तथा वायु प्रदुषण व अपशिष्ट की अधिक मात्रा के बारें में संवेदनशील विवरण प्रस्तुत किया| फसलों को कीटों से बचाने के लिए व्यापक स्तर पर कीटनाशकों का प्रयोग विकसित देशों में किया जाने लगा जिसका परिणाम यह हुआ कि बहुत से जीव-जंतु धीरे-धीर विलुप्तप्राय  हो गए| यहीं नहीं मौषम में भी व्यापक परिवर्तन देखने को मिला| बसंत के आ जाने के बाद भी बाग़-बगीचों में बसंत दिखना बंद होने लगा| वर्षा भी अनिश्चित कालीन होने लगी| अपने गहन अध्ययन में कारसन ने पाया कि इन सबके पीछे की मुख्य वजह फसलों में प्रयुक्त होने वाली कीटनाशक दवाएं तथा विभिन्न प्रकार के प्रदुषण हैं| कारसन द्वारा प्रस्तुत इस संवेदनशील विवरण ने आधुनिक पर्यावरण आन्दोलन को छेड़ने में मदद की| इसके बाद से लोगों का ध्यान धीरे-धीरे इस दिशा में जाना शुरू हुआ| इसके कुछ ही समय बाद 1963 में न्यूक्लियर परिक्षण से निकलने वाली रेडिओं एक्टिव प्रभाव के प्रति भी लोग जागरुक हुए | 1960 के दशक में ही अन्तराष्ट्रीय समुद्र तथा समुद्रीय तट के प्रयोग को लेकर भी व्यापक विचार विमर्श हुआ तथा तय हुआ कि कोई भी समुद्र तटीय देश अपनी सीमा से 200 मील अन्दर तक अपनी आर्थिक गतिविधियों को संचालित कर सकता है| 1960 के दशक में पर्यावरण को लेकर बढ़ी चिंता ने विश्व को एक महत्वपूर्ण समझौता करने के लिए विवश किया| एक आन्दोलन के रूप में पर्यावरण शिक्षा के बारे में पहला लेख 1969 में जेम्स ए स्वान द्वारा डी फेल्टा कम्पन में प्रकाशित हुआ| पर्यावरणीय शिक्षा की पहली परिभाषा भी 1970 में विलियम स्टाप ने लिखी जो उनेस्को के पर्यावरणीय शिक्षा के प्रथम निदेशक बने| इसी क्रम में 22 अप्रैल सन 1970 में पहला ‘विश्व पृथ्वी दिवस’ मनाया गया| इसी वर्ष अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन द्वारा पर्यावरणीय शिक्षा अधिनियम को स्वीकृति प्रदान की गयी| जिसका प्रमुख उद्देश्य ‘K-12 तक के विद्यालयों में पर्यावरणीय शिक्षा को सम्मिलित करना था’| इसके बाद 1971 में The National Education for environmental education’ की स्थापना हुयी जिसका उद्देश्य ‘पर्यावरणीय शिक्षा कार्यल्रम को प्रोत्साहित करना तथा अध्यापकों को संसाधन उपलब्ध कराकर पर्यावरण साक्षरता में वृद्धि करना था|’ अन्तराष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरणीय शिक्षा को मान्यता तब मिली जब 1972 में स्वीडेन के स्टाकहोम में UN कांफ्रेंस ने पर्यावरणीय शिक्षा को पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान का एक आवश्यक उपकरण घोषित किया| इसके बाद UNESCO (उनाईटेड नेशंस एजुकेशन साइंटिफिक एंड कल्चरल आर्गनाइजेशन ) तथा UNEP (उनाईटेड नेशंस इनवार्न्मेंटल प्रोग्राम) ने ऐसी तीन घोषणायें की जिसने पर्यावरणीय अध्ययन को गति प्रदान की| 1-स्टाकहोम घोषणा पत्र-1972- सात घोषणाओं और 26 सिद्धांतों से बने इस घोषणा पत्र का मुख्य उद्देश्य ‘संसार के लोगों को मानव पर्यावरण के संरक्षण और बेहतरी के लिए प्रेरित और निर्देशित करना था|’ 2-बेलग्रेड चार्टर-1975 – यह चार्टर पर्यावरणीय शिक्षा पर अन्तराष्ट्रीय कार्यशाला का परिणाम था जो युगोस्लोवाकिया की राजधानी बेलाग्रेंड में आयोजित की गयी थी| यह चार्टर स्टाकहोम घोषणा पत्र पर आधारित था तथा पर्यावरणीय शिक्षा के कार्यक्रम के उद्देश्यों, लक्ष्यों और मार्गदर्शन सिद्धांतों को जोड़ता है| यह पर्यावरणीय शिक्षा के लिय स्रोताओं को परिभाषित करता है|ताबीलिस घोषणा-1977- यह घोषणा पत्र स्टाकहोम सम्मलेन व बेलग्रेड चार्टर को अद्दतन रूप में प्रस्तुत करता है| ताबिलिस में पर्यावरण शिक्षा पर हुए अंतरसरकारी सम्मलेन में जार्जिया ने वैश्विक पर्यावरण व बेहतरी में पर्यावरण शिक्षा की भूमिका पर बल दिया व पर्यावरणीय शिक्षा के लिए ढाँचे व दिशा निर्देश प्रदान करने की मांग की| इस सम्मलेन ने पर्यावरण शिक्षा की भूमिका, लक्ष्य व लक्षणों को प्रस्तुत किया तथा इसके लिए अनेक लक्ष्यों और सिद्धांतो को उपलब्ध कराया|

निष्कर्ष -

आज पारिस्थितिकी विज्ञान ने सिद्ध कर दिया है कि ‘आर्थिक विकाश की दौड़ में हमारे पर्यावरण को कितनी क्षति पहुंचती है’ और पर्यावरण प्रदुषण मानव जीवन के लिए कितना हानि कारक है | आज जरुरत है की हम पर्यावरण की रक्षा के हित में अपने आर्थिक समृद्धि का बलिदान करें’| पर्यावरणवादियों का स्पष्ट सुझाव है कि ‘निजी वाहन की जगह सारवजनिक वाहन प्रयोग करें तथा मांस मछली की जगह साग-सब्जी को प्राथमिकता दें और कोयला तथा न्यूक्लियर ऊर्जा की जगह सौर ऊर्जा तथा पवन ऊर्जा का प्रयोग करें’| पर्यावरणवाद सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण को अपना लक्ष्य मानते हुए एक ऐसे भविष्य का सपना देखता है जिसमे मनुष्य अपनी गतिविधियाँ तो नहीं बढ़ाएगा परन्तु सम्पूर्ण जगत के प्रति अपने दाइत्व को लेकर सजग अवश्य रहेगा’|

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  सादर:
 राजू पटेल

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