एक नजर

Saturday, 26 October 2019

सरकार की बढ़ते निजीकरण की नीति से लोककल्याण को खतरा || Privatization In India In Hindi

सरकार की बढ़ते निजीकरण की नीति से लोककल्याण को खतरा || Privatization In Hindi[in India]



सरकार के द्वारा बनाई गयी नीतियों को समान्यतौर पर लोक कल्याण से जोड़ कर देखा जाता है लेकिन पिछले कुछ वर्षो में सरकार निजीकरण का पर्याय बन गयी है देश में तेजी से बढ़ रही अंधी निजीकरण कि दौड़ ने मुझे अपना ध्यान इस बिंदु की ओर मोड़ने के लिए विवश कर दिया है |

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि        

भारत में निजीकरण कि  शुरुआत १९९१  से मानी जाती इसी समय भारत की अर्थव्यवस्था को ओपन कर  दिया जाता है भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एलपीजी यानी उदारीकरण , निजीकरण , वैश्वीकरण अपनाया गया , सम्भवतः यही से  सैद्धांतिक आधार शिला रखकर निजीकरण कोबढ़ावा दिया जाने लगा  इसका मुख्य उद्देश्य था भारत की अर्थव्यवस्था में तेजी लाना |

निजीकरण का अर्थ :

शब्दार्थ की दृष्टिकोण से देखे तो निजीकरण का अर्थ  निजी क्षेत्र के लिए व्यापार व सेवाओं तथा सार्वजानिक क्षेत्र अर्थात सरकार के स्वामित्व वाले की वस्तुओं या संस्थाओं का निजी संस्थाओं के हस्तांतरण से है जिसमे निजी संस्थाओं की भागीदारी होती है पर सरकार का नियंत्रण नही होता कुछ नियम जरुर होते है उन्हें रेगुलेट करने के लिए परन्तु वास्तव में इन संस्थाओं पर सरकार किसी प्रकार का दबाव नही बना सकती की वे लोक कल्याण के कार्य करे |

सरकार के द्वारा बनाई गयी  निजीकरण की प्रमुख नीतियाँ  : 


द वायर मे छपे एक लेख के मुताबिक  हवाई अड्डो के निजीकरण में वित्त मंत्रालय और नीति आयोग के दिशा निर्देश को किया गया  नज़रअंदाज़ में बताया गया की पीपीपी  मॉडल अर्थात पब्लिक व प्राइवेट पार्टनरशिप के अंतगर्त देश के कुल छ : हवाईअड्डे का ठेका का कार्य अडानी को दे दिया गया | आज तक में छपे एक लेख पियुस गोयल बोले नही होगा रेलवे का निजीकरण , पीपीपी माडल पर विचार के मुताबिकये बात रेलवे को निजी हाथों में देने को लेकर विचार चल रहा  जिसमे ५० रेलवे स्टेशन व १५० ट्रेनों के निजीकरण के बात उठी थी पर गोयल ने कहा की निजीकरण नही करेगी सरकार बल्कि पीपीपी माडल पर विचार कर रही है आप बता दे की पीपीपी माडल के दिखावा मात्र है   असल में इसमें बड़े बड़े कॉर्पोरेट घराने को ही टेंडर दिए जाते है राजनैतिक लाभ की लिहाज से| शिक्षा हो , व्यापार हो, पर्यटन , मनोरजन जगत हो हर क्षेत्रों में तेजी से नीति कम्पनियों की भागीदारी बढ़ रही है कोई पालिसी हो उसमे क्रियान्वयन में भी निजी कम्पनियों का सहारा लिया जा रहा है |अभी हाल ही आई न्यूज़ के मुताबिक भारत में कई विश्वविद्यालयों को निजी हाथों ने देने की बात चल रही है |प्राथमिक विद्यालयों को भी पूरी तहर से निजी हाथों में देने पर विचार किया जा रहा है |देश के कई धरोहरों को सरकार के द्वारा नीलम किया गया उसको निजी हाथों को सौप दिया गया | भारत की नौ रत्न कही जाने वाली कम्पनी की इसके पंजे से नही बच सकी उन पर भी सरकार के निजीकरण का रंग छा गया |तेजी से देश में शिक्षा का व्यवसायीकरण हो रहा है शिक्षा भारत की रीड की हड्डी हो उसे भी खोखला करने का प्रयास किया जा रहा है |भारत सूचना प्रद्योगिकीय  के कम्पनियों को बढ़ावा न देकर निजी कम्पनियों को बढ़ावा दिया जा रहा 
निजीकरण नकारात्मक प्रभाव :

भारत में निजीकरण की नीति को बढ़ावा देने के पीछे के जो तर्क दिए जाते है उनमें कार्यो में तेजी लाने , भष्ट्राचार  मुक्त देश का निर्माण करना , पारदर्शिता लाने इत्यादि लाभ गिनाए  जाते है लेकिन इसके वास्तविकता कम ही सरोकार है |  इसने भारत ही नही विश्व के कई देशों में  बढ़ी भारी मात्र में नुकसान देखने को मिला उदाहरण स्वरूप ब्रिटेन ( सत्याग्रह न्यूज़ पेपर )  देश जो खुद निजीकरण की हिमायती करता है आज वो भी उनसे दामन बचाने के बारे में सोच रहा है | इससे देश में तेजी से भाई भतीजावाद बढ़ा है  , व्यक्तिगत  हित साधने के लिए बड़े स्तर पर देश के बड़े बड़े लोक हित से जुड़े  मुद्दे , नीतियों को लागू करने का उन्हें ठेका निजी कम्पनीयों को दे दिया जा रहा है |  इससे न केवल देश में निचले तबके की स्थिति सोचनी हुई अपितु  इसके रोजगार , शिक्षा , राजनैतिक , स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव तो पड़ा ही है इससे देश की अर्थव्यवस्था को भी काफी नुकसान पहुचने का कार्य किया है इससे न केवल व्यक्ति के शारीरिक पतन हुआ है अपितु मानसिक विकार में भी बढ़ोत्तरी हुई है कम वेतन पर व्यक्ति को दूना कार्य कराना भी पड़ा है महगाई जो बढ़ी वो अलग,|



क्या कहती है रिपोर्ट  :

आज तक में छपे एक लेख के मुताबिक : आखिरकार सरकार ने माना - बेरोजगरी दर ४५ सालों में सबसे ज्यादा  में केन्द्रीय सांख्यिकी  कार्यालय की रिपोर्ट के अनुसार बेरोजगारी ६.१ पायी गयी  |दृष्टिआईएएस में छापे एक लेख निजीकरण और मानवाधिकार पर सयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार निजीकरण से सार्वजनिक वस्तुओं पर से अधिकार समाप्त हो रहे है जिससे मानवाधिकार बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है और इससे गरीब तबके के लोग और हासियें   पर चलते जा रहे है |जनसत्ता में छपे के लेख राजनीति : लाभो का निजीकरण व हानि का सरकारीकरण में बताया गया की सरकार लाभ कमाने की चाह से निजीकरण के परिणाम स्वरूप जब सभी बैक  नाकाम हो जाते है तो ऐसी परिस्थिति में सरकार को उनको अपनाना पड़ता है जो स्पस्ट रूप से प्रदर्शित करता है की लाभों का निजीकरण करने से राजनैतिक लाभ मिलते है और जब निजी कम्पनी घटे में चल रही होती है तो सरकार उसे प्रोमोट कर हानि का सरकारीकरण करती है इस लेख में इस ओर भी जनता का ध्यान खीचने की कोशिश की भारत के बड़े बड़े उद्योगपति जिन्होंने भारत के बैको से करोडो रूपये लिए वे लेकर विदेश चले गये इससे भारतीय बैको को खासा नुकसान सहना पड़ा जिसे इन्होने सिद्ध करने के लिए कुछ आकड़ों का सहारा लिया है रेटिग एजेंसी आइसीआरए के आकडे बताते है २०१७ में पिछले दश सालों के १ लाख ४४ करोड़ रूपये ढूब गये इस नुकसान में ८३ % सरकारों बैक के पैसे शामिल है इस लेख में  बात  को ओर भी इशारा किया गया की यह रिपोर्ट एनपीए यानी डूबता बैको के कर्ज पर भी प्रकाश डालती इसमें ये बाते बतायी गयी की२०१३- २०१७ के बीच डूबते कर्जो में ३११ % की बढोत्तरी दर्ज की गयी जो १.५५ लाख करोड़  से बढ़कर ६ लाख करोड़  हो गयी वित्त मंत्री अरुण जेटली ने लोकसभा में प्रश्न के उत्तर के जवाब में बताया की १२% बढोत्तरी दर्ज की गयी इससे निजी बैंक भी नही बचे है २०१३ में १९९८६  से बढ़कर ७३८४२ करोड़ हो गया है  ,बैकिंग के क्षेत्र में हानि का सरकारीकरण की शुरुआत कब हुई उस ओर भी ध्यान घिचा गया १९६९ ई ० निजी बैकों के सरकारीकरण ( राष्ट्रियकरण ) की शुरुआत हुई जिसे हानि का सरकारीकरण के रूप देखा जा सकता है |अभी हाल ही में हिंदुस्तान न्यूज़ पेपर में छपे एक लेख बनर्जी ने निजीकरण पर अपने विचार देते हुवे ये कहा की निजीकरण की नीति से प्रभावित हुवे  बड़े  स्तर पर लोग बेरोजगार हुवे  इससे निजात पाने के लिए कम्पनियों पर सरकार के द्वारा टैक्स लगाये गये ताकि निजीकरण के प्रभाव से बेरोजगार हुवे  लोगो  को बेरोजगारी  भत्ता दिया जा सके | अभी हाल में ही आई  बीबीसी की न्यूज़ के अनुसार चिली में निजीकरण के कारण स्वास्थ्य एवं शिक्षा पर काफी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है ये काफी  महगे हो गये है इससे गरीबो और अमीरों के बीच खायी यो गयी है इससे करीब 10 लाख लोग रोड़ पर उतरे के लिए विवश हो गये है जिससे हिंसा फ़ैल रही है |न्यूज़ वन इंडिया में छपे लेख के मुताबिक़ बिजली के निजीकरण करने से निजी कम्पनियां इसका गलत फायदा उठायेगी ,  इस पर सरकार का नियंत्रण भी नही होगा | दैनिक भाष्कर में छपे एक लेख २५ करोड़ में डालमिया ग्रुप में लाल किला को गोद लिया   के अतगर्त  धरोहरों का निजीकरण करना मुनाफा कमाने की नीति के रूप दिखाया गया जबकि केन्द्रीय पर्यटक राज्य मंत्री महेश शर्मा ने इस लेख के अंतगर्त सरकार का बचाव करते हुवे ये कहा की ऐतिहासिक धरोहरों का निजी हाथों में इस लिए नही दिया जा रहा की उससे लाभ कमाया जा बल्कि उसके संरक्षण व सवर्धन का दायित्व उन्हें सौपा जा रहा है |
निष्कर्ष : 

उपयुक्त विवरणों से यह स्पष्ट हो रहा है की निजीकरण मानव जीवन के प्रत्येक पहलु को प्रभावित कर रहा है  सुबह से लेकन रात तक हम किसी न किसी रूप  निजी सेवाओं से घिरे हुवे है यातायात के परिवहन जैसे कार , मोटर साईकिल , जहाज ,या फिर रोजमरा की जरूरतों की चीजे सब ने हमे घेर रखा | हम किसी न किसी रूप में इस निजीकरण के व्यवस्था से प्रभावित हो रहे है हमारा जन जीवन इससे बहुत हद तक प्रभावित हो रहा है , शिक्षा , स्वास्थ्य , रोजगार हो ,सुचना व प्रौग्योगिकी मोबइल से लेकर लैपटॉप के चार्जर तक , सभी क्षेत्रों में निजीकरण छाया हुवा है जिससे बच पाना मुश्किल है इसके प्रभाव से जन- धन की हानि हो रही है शिक्षा व स्वास्थ्य महगी होते जा रहे है इससे गरीब और  गरीब और अमीर और अमीर होते जा रहे है देश में बढ़ते बेरोजगारी से  देश में हिंसा बढ़ोत्तरी हो रही है इस निजीकरण से उभरने के लिए दुसरे देशों के नागरिकों को अपने देश ने निकालने तक की नौबत देखने को मिल रही है इससे लिए एक काफी प्रचलित सिद्धात भी है जिसे भूमि पुत्र के सिद्धांत के रूप में जानते है हर साल गरीब व्यक्ति के पास पैसे न होने के कारण वो  अपना इलाज नही करा पाते  और मौत की आघोस में सो जाते है क्योकि निजीकरण से स्वास्थ्य की सेवाए  इतना महगी हो गयी है  की आमजन के बस की बात नही की वो अपना इलाज भी करा सके | पहले निजी कम्पनियां लोगो को लालच देती है सस्ती वस्तुओ  की , फिर बाद में वस्तुओं के दामों में बढ़ोत्तरी कर देती है शनै शनै कर उन्हें चूसने का कार्य करने लगती है |      

इस लेख का उद्देश्य सरकार की निंदा करना नही  है बल्कि सरकार की आलोचना करना है ताकि सरकार अपनी कमियों को समझे और उनमे सुधारे करे  , यह लेख सरकार के विरुद्ध नही लिखा गया है बल्कि उन कमियों की ओर  सरकार का ध्यान घिचने की कोशिश करता है जिन नीतियों से लोक कल्याण प्रभावित हो रहा |

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