Importance Of Tree In Hindi [Story essay]

‘’एक कदम पेड़-पौधों की ओर’’ || Importance Of Tree In Hindi [Story essay]

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 ‘’एक कदम पेड़-पौधों की ओर’’
बरसातीटोलाएक खुशहाल गाँव था | यहाँ के लोग मुख्य रूप से खेती का काम किया करते थे| गाँव में चारों तरफ पेड़-पौधे होने के कारण हरियाली छाई रहती थी| गाँव के बच्चे, बड़े, बूढ़े, नौजवान सभी पेड़ के नीचे दोपहरिया बिताया करते थे| बच्चे बारहों महीने बगीचें के आँचल में खेल खेला करते थे|
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कुछ दिनों बाद उस गाँव में पेड़ का एक बड़ा व्यापारी आया|उसका मन उस गाँव के आसमान छूते पेड़ को देख ललच सा गया, वह मन ही मन सोचने लगा ‘अगर इन पेड़ों को काटकर बाजार में बेचा जाय तो इससे खूब सारा पैसा कमाया जा सकता है’|व्यापारी नेउस गाँव के लोगों को अपनेपेड़ बेचने के लिए खूब लालच दिए | लालच में आकर लोगों ने अपने पेड़ धीरे - धीरे उस व्यापारी को बेच दिए | 
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खुछदिनों तक लोगों ने इनपैसों से खूब मस्ती की | देखते ही देखते पूरा गाँव वीरान उजाड़सा हो गया | दूर - दूर तक कोई पेड़-पौधे नहीं, कोई हरियाली नहीं|अबदोपहरिया बिताने के लिए कोई पेड़ नहीं, कोई बगीचा नहीं| बच्चों के खेल का हरा भरा मैदान भी छीन गया| लोग घरों में रहने के लिए विवश हो गए| अबगोलवा आम , कौआ लिलनवा आम, देसियवा आम , लंगडा आम , दशहरी आम...आदिगाँव के लोगों के लिए एक सपने जैसा लगानेलगा| अब अगर बच्चें आम के लिए जिद करते तो बाजार से एक, आध किलो लाकर दे दिया जाता, उसमे भी परिवार के कुछ लोगों को मिल पाता तो कुछ लोगों को नहीं | लोग मन मसोस कर रह जाते थे| बात अगर यही तक रहती तो कोई बड़ी समस्या नहीं थी| समस्या तब और विकट रूप धारण करती गयी जब धीरे-धीरे बारिश कम होने लगी और गर्मीतेजी से बढ़ने लगी| अब तो गाँव में समस्याओं की कतार सी लगने लगी|इधर समय से बारिश न होने के कारण उंचाई वाली फसले पानी के अभाव में सुखने लगी| नीचले इलाकों में जैसे - तैसे लोग कुओं से सिचाई करके थोड़ी बहुत फसल उगा लेते थे | ये क्या इस साल तो बिलकुल न के बराबर बारिशहुयी| इस बार तो कुओं में भी पानी नहीं भर पाया | कुएं ही सिंचाई व पीने के पानी के मुख्य साधन थे| अब वो भी सुखने लगे| पुरेगाँव में केवलतीन ही ऐसे कुएं बचे थे जिसमे पानी भरा था| गाँव में पांच हैण्डपंप भी थे जो दो साल पहले तक बहुत अच्छे से पानी दिया करते थे लेकिन ये क्या अब तो इन हैण्डपम्पों ने भी पानी देने से मना कर दिया| पुरे दिन में बड़ी मुश्किल से हैण्डपंप से चार, छः बाल्टी ही पानी निकल पाता था | वहीँपानी से भरे तीन कुएं के जगत पर हमेशा लाइन लगी रहती थी| लोग शाम को जाकर लाइन लगाकर खड़े हो जाते और सोचते की सुबह होते - होते उनका नंबर आ ही जाएगा|पानी के लिए लड़ाई झगड़ा ऊपर से करनी पड़ती थी| कोई अगर लाइन छोड़ पखाने चला जाता तो वापस आने पर लोग उसे लाइन में नहीं घुसने देते| यहाँ तक की कभी - कभी झगड़ा इतना बढ़ जाता थाकि लोग आपस में मार - पीट भी कर लेते थे| अबजबइंसानों के लिए पीने का पानी मिलनामुश्किलहो गया तो जानवरों और फसलों को कहाँ से पानी पिलायें? कुछ समय पहले जो खेत हरी भरी फसलों से लहलहायाकरतेथे अब मानों उन्हें नजर सी लग गयी हो या वो रूठ सेगए हो| जिस जमीन से पहले भीनी - भीनी खुशबू आया करती थी अबवो मरे जानवर की तरह मानो मूंह बा दिए हो | इस साल तो अन्न का एक दाना भी गाँव में पैदा नहीं हुआ | लोग पिछले साल का जो कुछ बचाकर रखे थे उसी से किसी तरह गुजर-बसर चल रहा था लेकिन ये कितने दिनों तक चलता.......| कुछ घर तो ऐसे भी थे जहां लोगों को एक वक्त की रोटी भी नहीं मिल पाती थी| पहले जहाँ लोग अपने खेत खलिहान के कामों में व्यस्त रहा करते थे अब मानों बेरोजगार से हो गए थे| किसी के चहरे पर हंसी के एक छीटें भी नहीं दिखाई देते | सभी के चहरे पर उदासी के सिकन देख लगता मानों गाँव में कोई बड़ा मातम हो | पिछले तीन महीने में छः मासूमबच्चों की भूख से मौत भी हो गयी | उधर पैसो के अभाव में दवाई न मिलने से गाँव के चारहट्टे-कट्टेनौजवान भी काल के गाल में समा गए|चारे और पानी की समस्याकोदेख लोगों ने अपने जानवरों को खुला छोड़ दिया ताकि वे घुम फिर करअपना पेट भर सकें | अबये जानवर भी पानी बिना तो रह नहीं सकते थे | देखते ही देखते गाँव के सारे जानवर मानो गायब से हो गए | गाँव के किसी भी कोने में चले जाएँ आपको एक दो जानवर मरे-सड़े जरुर दिख जायंगे |
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 पानी का कोई और विकल्प ना दिखने पर लोगों ने धीरे धीरे गाँव से पलायन करना शुरू कर दिया| एक समय थाजिस गाँव के लोग दुसरे की सहायता करते थे आज सहायता के लिए मुहताज हुए जा रहे थे लेकिन उनकी सहायता के लिए दूर दूर तक कोई नहीं दिखाई दे रहा था | भिखारियों जैसे भेष में लोग पानी की तलाश में अपने परिवार के साथ दुसरे गाँव की तरफ रुख कर रहे थे| देखते ही देखते पूरा गाँव खाली हो गया | उनकेघर-मकान अब खँडहर में तब्दील होने लगे| एक समय था जब आस-पास के लोग इस गाँव की सम्पन्नता देख आश्चर्य चकित हुआ करते थेऔर मन ही मन सोचते ‘काश मेरा घर भी इस गाँव में होता’ | अब शायद ही कोई व्यक्ति यह कह सकता था की काश मेरा भी घर इस गाँव में होता| कीट-पतंगे और बाकी के जानवर भी मानों उस गाँव से विदाई ले लिए हो | लोग घर का सामान इकट्ठा कर सर सेढोने के लिए मजबूर थे | संसाधनों के अभाव में रास्त्ता मानो पहाड़ सा लगता | खाने –पीने की समस्या ऊपर से | ऊपर से अगर कोई बीमार पड़ जाता तो आफत और बढ़ जाती थी | जहां तहां पानी की व्यवस्था देख लोग विश्राम करते | कई दिनों की लम्बी यात्रा के बाद धीरे–धीरे लोग शहरके नजदीक आ गए | उनकोयहाँ आशा की कुछ किरणेंदिखाई देने लगी | लोगों ने सोचा यहाँ मजदूरी करके गुजारा कर लेंगे | अब लोग जहां - तहां शहर में फ़ैल गए | एक समय था जब गाँव के सभी लोगएक जगह इकट्ठा होकर रहा करते थे | किसी के यहाँ कोई कार्य - प्रयोजन होता तो लोग मिलकर मनाया करते थे| | अब तो लोगों का एक दुसरे से मिलना भी दूभर हो गया था| रहने की और काम की समस्या ने लोगों को गालियाँ व मार खाने के लिए मजबूर कर दिया था | कोई किसी के यहाँ काम माँगने जाता तो वह तू तड़ाक की अंदाज में बात करता, गालियाँ भी देता यहाँ तक की मार कर भगा भीदेता था | ये क्या जो लोग एक समय लोगों को अपने यहाँ काम दिया करते थे आज दूसरों के सामने काम माँगने के लिए गिड़गिड़ा रहेथे | जो एक समय दो, चार, दस नौकरों के मालिक हुआ करते थे और सर उठा कर शान से बात किया करते थे आज अपने आपको नौकर बनाने के लिए मारा - माराफिर रहे थे | फिर भी कोई उन्हें नौकर बनाने के लिए तैयार नहीं था | जो एक समय अपने संगमरमर लगे घरों में ठाठ - बाठ से रहा करते थे आज खुले आसमान के नीचे रहने के लिए मोहताज थे| खुला आसमान भी बड़े मुश्किलों से नसीब होता था | अब सड़क की पटरी ही उनका घर बन गया था | सभीसड़क के किनारे फूटपाथ पर सोने के लिए मजबूर थे | एकसमय जो सड़क पर गिरी हुयीचीज को उठाना अपनी बेइज्जती समझते थे आज सड़क पर गिरे सामानों को उठाकर अपना जीवन यापन करने के लिए विवश थे | सभी लोग मामूली सी मजदूरी और रोटी के लिए अपने को दासों की तरह बेचने के लिए मजबूर थे| यहाँ तक की 100 रूपये का काम 10 रुपये में भी करनेसे वो परहेज नहीं करते थे ,दिल में बस एक ही दिलासा होती थी की चलो दो वक्त की रोटी तो जैसे- तैसे मिल जायेगी | रोटी ने महिलाओं को गलत काम करने के लिए मजबूर कर दिया | दो वक्त की रोटी ने उनकी कमर ऐसी तोड़ी की घटिया से घटिया काम भी उनके लिए घटिया नहीं रहा अब| एक समय हुआ करता था जब इन महिलाओं की तरफ कोई बाहरी व्यक्ति आँख उठाकर भी नहीं देख सकता था | उनमे हिरनी सी खूबसूरती थी तो शेरनी जैसी साहस भी हुआ करती थी | आज उनके ये दोनों गुण मानों कब्र में दफ़न से हो गए हो| अब ना उनके चहरे पर वो हिरनी जैसी चमक रही ना शेरनी जैसी शान रही | उनके रूखे पड़े बदन को शहर के भूखे भेड़िये नोच खाने के लिए तैयार थे | इनभेड़ियों में हर किस्म के भेडियें हुआ करते थे | कोई अध्यापक, तो कोई व्यापारी, तो कोई दिहाड़ी मजदूर, तो कोई डाक्टर | यहाँ तक कीवो सभी भेडियें के इस गैंग में शामिल थे जो बड़े बड़े मंचों से महिला सम्मान की बड़ी बड़ी बातें किया करते थे | भूख ने उन शेरनी के मानों नाख़ून क़तर दिए हो, जिससे वह अपने शिकारियों पर हमला किया करती थी | बाप-बेटे के सामने ही उनकी इज्जत नीलाम होती थी लेकिन वो जहर का घूंट घूंट पीकर रहने के लिए विवश थे | एक समय हुआ करता था जब इनकी बहु - बेटियों की तरफ कोई आँख उठाकर देख लेता था उसकी आँख फोड़ दी जाती थी|मगर अब रोटी ने उन्हें खामोश कर दिया था | मर-मर कर जी रहे लोग हमेशा बादलों को निहारा करते थे कि कब बारिश हो और वो अपने घर खेतों की ओर चल पड़े | आसमान देखते - देखते यूँ ही कई साल बीत गएबारिश ने दर्शन तक नहीं दिए | मानो बारिश उनसे रूठ सा गया हो |
      इन्ही भीषण परिस्थितियों के बीच एक व्यक्ति ऐसा भी था जो उसी गाँव में बना रहा| उसका शरीर मानों पत्थर सा हो गया था जो बिना पानी के भी अपने आपको ज़िंदा रखे हुए था| कभी पेशे से एक बड़ा अध्यापक हुआ करता यह व्यक्ति अब इस वीरान से गाँव को फिर से हरा - भरा व ज़िंदा करने के लिए अपने आपको समर्पित कर दिया था | उसने एक बार फिर से सून हो चुकी इस धरती की गोद को भरने का मानो बेड़ा उठा लिया हो | पेड़- पौधे लगाना और उनकी सेवा करना ही मानो उसकी जिंदगी का मुख्य उद्देश्य था| थोड़ी बहुत बारिश से कुएं में जो पानी हो जाताथा उसी से वह अपने नन्हें मुन्हे और नाजुक से पेड़ों को सींचता था मानों माँ अपने शिशु को दुग्धपान करा रही हो | हजारों हजार की संख्या में पेड़ लगाते, उन्हें सींचते लेकिन उनमे से केवल कुछ पौधे ही चल पाते थे बाकी के नाजुक पौधे धुप सहने से मना कर देते और अपने प्राण त्याग देते थे | धीरे धीरेअध्यापककी मेहनत रंग लाने लगी | देखते ही देखते दो-तीन सालों में छतरी जितना छाया देने वाले वृक्ष तैयार होने लगे | दो तीन साल पहले जहां इस धरती पर हरियाली का नामो निशाँ नहीं दिखाइ देता था अब उसमे हरियाली के छीटें दिखाई देने लगे थे | अब कोई इन मासूम पेड़ों के नीचे बैठ सकता था और स्वर्गानन्द की अनुभूति कर सकता था | अध्यापक के प्रयासों के मीठे फल को देख कुछ और लोग आगे आये | अब क्या पेड़ लगाने का काम जोर- शोर से चल पड़ा| देखते-देखते धरतीका नंगा बदन हरी साड़ी के आँचल से ढकने लगा | उधर बादल भी अब थोड़ी बहुतमेहरबानी दिखाने लगे | बारिश ने मानों अबअपनी नाराजगी दूरकरनेका फैसला कर लिया हो | अभी भी उतनी बारिश नहीं होती है जितना की एक समय हुआ करती थी | फिर भी पहले से स्थिति काफी अच्छी हो चली थी | धीरे - धीरे घास और छोटी - छोटी झाड़ियों ने भी धरती की सुनी गोद को भरने का काम करना शुरू कर दिया | रूठे हुए किट-पतंगे और जानवर भी अब घर को वापस लौटने लगे थे | अध्यापक और उनके साथियों के प्रयासों को देख अब अनेक लोग उनके साथ हो लिए थे | सभी का मुख्य काम केवल पेड़-पौधे लगाना और धरती को गोद को हरा–भराकरना था | अबसालदर साल बारिश अच्छी होने लगी| कुओं में फिर से लभालभ पानी भरने लगा |
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अब तो यहाँ पर पहले आये लोगों ने खेती भी करनी शुरू कर दी | यहखबर धीरे धीर शहर में रह रहे लोगों के पास भी पहुँचने लगी जो वर्षों पहले पानी की किल्लत के कारण अपना स्वर्ग जैसा गाँव- घर छोड़ गए थे | लोग धीरे – धीरे अपने गाँव की ओर प्रस्थान करने लगे | जो कोई भी वापस अपने गाँव आता पहले अध्यापक को प्रणाम कर उसे धन्यवाद देता था, उसके पैरों पर ऐसे गिरते मानों उन्होंने उनको एक नयी जिंदगी दी हो | लोग अध्यापक की प्रशंसा किये थकते नहीं थे | जहां देखो वहां अध्यापक के त्याग और मेहनत की ही चर्चा चलती थी | लोग अपने छोटे बच्चों को उस अध्यापक की कहानियां सुनाने लगे | लोगएक बार फिर से गाँव के सभी लोग अपने खेतों में फसल उगाना शुरू कर दिए थे | एक बार फिर से लोगों के घर अनाज से भरने लगे थे | एक बार फिर से लोगों को भरपेट खाना मिलने लगा था | सभी लोग अपने घर अध्यापक को दावत के लिए बुलाने के लिए अध्यापक की झोपड़ी के सामने कतार में लगे रहते थे| जिनके घर अध्यापक चले जाते वो अपने आपको बड़ा सौभाग्यशाली मानता था | अध्यापक जहां कहीं भी जाते आस - पास त्यौहार व मेले जैसा माहौल हो जाता था | अध्यापक भी जहां कहीं जाते बस लोगों को एक ही मन्त्र दिया करते थे की ‘ज्यादा से ज्यादा पेड़-पौधे लगाओ और अपना और इस धरती का जीवन खुशहाल बनाओ| त्यौहार हो या बच्चे का जन्म , शादी हो या कोई बड़ा कार्यक्रम हर अवसर पर पेड़ लगाओ’|


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यहाँ तक की अध्यापक जी जिनके घर पर जाते वहां सैकड़ों की संख्या में पेड़ लगाए जातेजिसका शुभारम्भ अध्यापक जी अपने हाथ से करते थे| यहीं नहीं अब जब कभीलोग अपने रिश्तेदारों के यहाँ भी जाते तो वहां मिठाई के बदले एक दो पौधा ले कर जाते थे | देखते ही देखते यह एक परम्परा सी बन गयी | कुछ दिनों बाद अध्यापक केनिश्छल परिश्रम की कहानियां किताबों में भी पढ़ाई जाने लगी | अब तक शायद लोग समझ चुके थे कि ‘’पेड़ ही उनका अस्तित्व है, पेड़ ही उनका जीवन है, पेड़ ही उनका सुख है’’| एक बार फिर से वह उजड़ा हुआ गाँव खुशियों और सम्पन्नता के परचम छूने लगा | फिर से लोगों में वो ठाठ- बाट आगयी| एकबारफिर से लोग दूसरों को काम देने वाले मालिक बनने लगे | एक बार फिर से उनका खोया हुआ आपसी प्यार वापस लौट आया | सभी एक दुसरे के सुख दुःख में एक बार फिर से शामिल होने लगे | गाँव में लोगों ने खूब सारे जानवर भी जिला लिए,गाँव में दूध दही की नदियाँ बहने लगी | एक बार फिरसे यह गाँव लोगों के लिए आश्चर्य का विषय बन गया| अभी कुछ समय पहले तक जो व्यक्ति इस गाँव में रुकने तककी नहीं सोच रहा था अब फिर से मन ही मन यह सोचने के लिए विवश हो गया कि‘काश उनका भी घर इस गाँव में होता’| गाँव में अच्छे स्कूल खुल गए, बच्चें स्कूल पढ़ने जाते और माता –पिता खेतों में काम के लिए निकल जाते | शाम को सभी एक जागे इकट्ठा होते और अपने दिन भर की बातों को एक दुसरे को बताते और मस्ती करते | अब लोगों के चहरे पर एक बार फिर से ख़ुशी की लहर दौड़ गयी थी | घर के बड़े लोग बच्चों को कहानियां बताते तो बच्चें अपने स्कूल में सीखी गयी बातों को घर के बड़ों को बताते,यानी सभी एक दुसरे से सिखने का प्रयास करते थे | एक बार फिर से गाँव की महिलाए हर क्षेत्र में अपना परचम फहराने लगी | अब शायद ही किसी की हिम्मत होती की इस गाँव की महिलाओं को आँख उठाकर देखा सके |अब गाँव के सभी लोगों ने आपसमेंमिलकर एक निर्णय लिया कि‘आगे से वे कभी भी पेड़ को ना तो काटेंगे और ना ही किसी व्यापारी को बेचेंगे, ये पेड़ हमारे बच्चें जैसे हैं हमें इनकी हिफाजत अपने से ज्यादा करनी होगी’’



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