एक नजर

Monday, 14 October 2019

क्या कभी पुरे हो पाएगे लैंगिक समानता के दावे ( Gender Equality In India )

लैंगिक समानता दावे व हकीकत || Gender Equality In Hindi[in India]

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लिंग के आधार पर भेद कोई नई बात नही है प्राचीन समय से ही भारतीय समाज में ये धारणा प्रचलित है की महिलाये पुरुषों से शारीरिक एवं मानसिक रूप से कमजोर होती है इसी बात को आधार बनाकर महिलाओ - पुरुषो के बीच कार्यो का बटवारा किया गया जिसे सार्वजनिक व निजी क्षेत्र के रूप में जाना जाता है | सार्वजानिक क्षेत्र से सम्बन्धित कार्यो का निर्वहन का दायित्व पुरूषों व निजी क्षेत्र के कार्यो का निष्पादन महिलाओं के द्वारा किया जाने लगा | gender equality in hindi के इस आर्टिकल में महिला एवं पुरुष  में भेदभाव पर विशेषचर्चा किया गया है | यही से महिलाओं की अधीनता व पुरुष वर्चश्व कि शुरुआत होती है | इस पर विभिन्न विद्वानों ने अपने अलग अलग मत व्यक्त किये है ताकि महिलाओं के समाजिक न्याय को सुनिश्चित किया जा सके जिन्हें विभिन्न नारीवादी दृष्टिकोण के रूप जानते है |


नारीवाद एक महिला केन्द्रित धारणा /दृष्टिकोण अथवा आन्दोलन है जो की महिलाओं की पुरुषों के समान समानता की बात करती है साधारण शब्दों में कहे तो महिलाओ के समाजिक न्याय की मांग करते है जिसमे समाजिक , आर्थिक , राजनैतिक न्याय का भाव अंतनिहित है   



विवाह में स्त्री का व्यापारिकरण - विवाह की प्रक्रिया और महिलाओं का जीवन संघर्ष कि लेखक गीतेश ने जैसा की स्पष्ट किया है की नारीवादी चिंतन 


 "पुरुष प्रधान और पितृसत्ता और लिंग के आधार पर भेदभाव करने वाले समाज में महिलाओं कि सामाजिक परिस्थिति का अध्ययन करता है| " 

उदार नारीवादी : 

उदारवादी लोगो का मनना है कि समाज के द्वारा बनाई वे संस्कृतियां जो महिला भेदभाव, महिला अधीनता ,पुरूषवर्चश्व  को बढ़ावा देती है वह गलत है |

उग्र नारीवादी  : 

जैविक ( बायोलॉजिकल फैक्वटर ) जो प्रकृति प्रदत्त के आधार पर हो रहे भेदभाव ,  लैंगिक ( क्रिएटेड /कल्चरल  के आधार पर : समाज द्वारा निर्मित वे नियम अथवा कानून ,मूल्य व मान्यताए जो महिला अधीनता को बढ़ावा देती है |) के आधार पर महिलाओ के साथ हो रहे भेदभाव को अनुचित मानते है |

समाजवादी नारीवादी : 

समाजवादी लोग महिलाओं की अधीनता का मुख्य कारण आर्थिक स्थितिय को मानते है |महिला की अधीन स्तिथि इसलिए बनी रही है क्योकि पुरुषो का सम्पत्ति पर वर्चश्व हमेशा से कायम रहा जो महिला अधीनता का कारक बना |
, ब्लैक फेमिनिस्ट, इको-फेमिनिस्ट , विचारको के द्वारा महिला अधिकार की मांग तेज हो गयी और आज के भी परिवेश में महिलाओ के अधिकार की मांग जारी है |

                        लैंगिक समानता क्या है ? 
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लैंगिक समानता का तात्पर्य  समाज के द्वारा बनाई वे संस्कृतियां जो महिला भेदभाव, महिला अधीनता पुरूषवर्चश्व  को बढ़ावा दे  उनको अनुचित मानते है तथा महिला व पुरुष दोनों के लिए समान संस्कृति की वकालत करती है ,  अवसर तथा संसाधनों पर पुरुषो के समान महिलाओं की सिफारिस करती है, राजनैतिक भागीदारी , समाजिक कार्यो में समान प्रतिनिधित्व , अवसर की समानता आदि लैंगिक समानता के सूचक है |समान्यतौर पर महिलाओं व पुरुषों के बीच संसाधनों व अवसर की उपलब्धता के रूप में जाना जाता है |


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                    क्या कहते है दावे  :

इस gender equality in hindi में लैंगिक समानता से जुड़े सरकारी आकड़ें प्रस्तुत किये गए है |

राष्ट्रिय परिवार सर्वेक्षण के अनुसार

महिला की स्वास्थ्य व शिक्षा की स्थिति में सुधार हुआ है महिला के घरेलु हिंसा के वारदात कम हुवे है आकडे ये बताते है की पिछले कुछ दशकों में ३७.2 % से घटकर २८.८ प्रतिशत हो गया है |उसी प्रकार महिलाओं की संख्या में प्रतिदिन बढ़ोत्तरी  व राष्ट्रिय व राज्य स्तरीय लिंगानुपात में सुधार हो यह स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करता है की समाज में महिला को भी पुरुषों के बीच भेद की जो रुढ़िवादी सोच है इसमें परिवर्तन हो रहा है |भारत की राष्ट्रिय लिंगानुपात २००१ पर ८२१ प्रति १००० पुरुष जो २०११ में बढ़कर ९४३ हो गया व विभिन्न राज्यों के लिंगानुपात पर एक नजर केरला के लिंगानुपात २००१ में १०५८ था जो बढ़कर १०८४ हो गया है , आंध्रप्रदेश २००१ में ९७८ जो २०११ में बढ़कर ९९२ , उत्तर प्रदेश २००१ में ८९८ जो २०११ में बढ़कर ९०८ हो गया| 


महिलाओ की स्थिति के बारे में क्या कहता है  हिन्दू धार्मिक साहित्यों    

भारतीय समाज सदैव से ये दावा करता है की महिलाए उनके लिए  देवी के तुल्य है जिनकी तुलना को  दुर्गा , काली ,दमयन्ती , सीता , आदि से करके उनकी पूजा अर्चना करते है |महिलायों को पुरुषो की अरधागिनीय के रूप व्यक्त किया गया है तथा  विवाह को एक पवित्र बंधन के बताया गया है |

क्या कहता है भारतीय संविधान 

भारतीय सविधान में लिंग के आधार पर भेदभाव निषेध तथा भारतीय संविधान में कुच्छ ऐसे प्रावधान किये गये ताकि महिलाओं को संरक्षण प्रदान किया जा सके अनु० १४,१५ ,१६ ,३९ ,२४३ इसके अलावा भारतीय संसद के द्वारा भी महिलाओं के संरक्षण के लिए समय समय पर प्रावधान किये गये | विधवा विवाह अधिनियम , घरेलु हिंसा अधिनियम इत्यादि |

महिलायों की स्थिति में सुधर के लिए विभिन्न सरकारी व गैर सरकारी संगठन कार्यरत है यह कार्य केवल राष्ट्रिय स्तर पर ही नही हो रहे है अपितु अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी विभिन्न सरकार व गैरसरकारी के द्वारा किये जा रहे है |
महिलाओं की भागीदारी प्रत्येक क्षेत्र में तेजी से बढ़ी है चाहे वह शिक्षा से जुड़ा हो , रोजगार से , व्यापार , महिलाएं हर क्षेत्रो में बढ़ चढ़कर भाग ले रही है |
भारतीर ही नही विश्व भर में   विधायकों , राजनैतिक दलों में महिलाओं  , के लिए कोटा में बढ़ोत्तरी देखने को मिली है |
 ग्रामीण स्तर पर महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की गयी है |

              कीकत बया करती रिपोर्ट :   

कौशल्या बैसंती ने  अपनी पुस्तक दोहरे अभिशाप में स्पष्ट किया है ठीक वही स्थिति आज भी समाज में बनी हुई एक भेद भाव महिला महिला होने के नाते सहन करती है तो दूसरा नीची जाति में जन्म लेने के कारण सहन करती है | 


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     फोटो साभार : Shutterstock


ऑनलाइन शोधपत्र में छपे एक पत्रिका जिसका शीर्षक है स्त्रीकाल स्त्री का समय और सच के अनुसार  आज भी जब घर में लड़का जन्म लेता है तो सोहर गाये जाते है खुशियाँ मनायी जाती है  जबकि लडकी के जन्म के समय ऐसा नही देखने को मिलता है हाँ समाज में कुछ बदलाव आये है ये बदलाव मामूली है |आज भी लडके को कुल का दीपक के धारणा हमारे समाज में प्रचलित है लडकियों को आज भी पराया धन के रूप में देखा जाता है |

 फ्रांसीसी लेखिका सिमोन द बोव्हुआर ने फ्रांसीसी भाषा में लिखी अपनी पुस्तक अग्रेजी में                            द सेकेण्ड सेक्स में कहा नारी जन्म नही लेती बल्कि बनाई जाती है  

आज भी कई लडकियो को साथ भेदभाव भाव किया चाहे व शिक्षा का क्षेत्र हो या रोजागार का बीबीसी के लेख ये महिलाये है इन्हें कम वेतन दो में बताया गया की आज विश्व में बहुत से देशो में महिलाओं को पुरुषो से कम वेतन दिए जाते है भारत में ये ये गैरबराबरी की तुलना में कहा की भारत की भी स्थिति कमोवेश उन्ही के समान है  इस रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया की १४२ देशो की सूची में भारत इसमें ११४ पायदान पर है जो दर्शाता है की आज भी भारत में महिला असमानता कितना ज्यादा है |
  डॉ० भीम राव अम्बेडकर  "किसी भी समाज का मूल्याकन इस बात से लगाया जा सकता है की उस समाज में महिलाओं की स्थिति क्या है " 
वर्ल्ड इकोनोमीक फॉर्म के अनुसार की जेंडर गैप इंडेक्स की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में ६५ % लैंगिक भेदभाव को ख़त्म किया है लेकिन अभी भी महिलाओं व पुरुषों के बीच लैंगिक भेदभाव को समाप्त करने में २०२ वर्ष लग जाने सम्भावना व्यक्त की गयी |भारत में लैंगिक भेदभाव ६६ % तक पाया गया वही दक्षिण एशिया देशो में ६५ % पाया गया |

आज भी महिलाओं की स्थिति समाज सोचनीय जिसका अनुमान य़ू०एन०ओ० की महासभा की २०१५   :  की उच्च स्तरीय बैठक से लगा सकते है जिसमे 17 सतत विकास लक्ष्यों में से एक लैंगिक समानता शामिल करना स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करता है कि भारत में ही नही दुनियाभर में लैंगिक असमानता समाज के लिए एक गहन चिंता का विषय है जिसमे भारत सहित दुनिया भर के १९३ देशो में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया |

 बीबीसी की रिपोर्ट १२९ देशो के सर्वे में पाया की आज भी भारत महिलाओं की स्थिति बहुत बुरी है | रिपोर्ट कहती है की आज भी भारत में लिंग के आधार पर भेद कायम है भारत में महिलाओं के साथ हो रहे घरेलु हिंसा के सम्बन्ध में राय लिया गया जिसमे ५१  % पुरुषो के घरेलु हिंसा ( पिटाई ) को सही माना यहाँ तक भारतीय महिलाओं के दिमाग में भी ये बात घर कर गयी रिपोर्ट ये भी कहती है भारतीय महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा से सही मानता है  जो कुल महिलाओं का ५४% है |
 सत्याग्रह स्कोल के लेख हमारी दुनिया के कपड़े तक लिंगभेदी है में स्पष्ट किया गया है हमारे समाज की संरचना ही कुछ ऐसी है लकड़ो व लडकियों में कपड़ो को भी लेकर भेद किया जाता है यहा तक की बच्चो और बच्ची तक के कपड़ो में भी लिंग आधारित भेद देखने को मिल जायेगा |
 घरेलु कार्यो को करने का  दायित्व केवल महिलाओं का ही है पुरुष खाना नही बना सकते ,झाड़ू नही लगा सकते यह कार्य महिलाओं का है ये सभी बाते लिंग आधारित भेद को ही प्रदर्शित करती है |
द वायर न्यूज़ की एक रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक लैंगिक समानता सूचकांक में १२९ देशों में भारत ९५ पायदान पर जो स्पष्ट करने के लिए काफी है महिलाओं समाज में अभी क्या स्थिति है |
center for the advance studies of india छपे एक लेख के मुताबिक भारत में अभी महिलाओं की सम्पत्ति के अधिकार में उनकी भागीदारी १३ %( भूमि के मालिकाना के लिहाज से )  है जबकि भारत भारत उत्तराधिकार में अधिनियम कब का पास हो चूका है |
विधायको व राजनैतिक दलों में महिलाओं के कोटा में कितनी बढ़ोत्तरी की गयी इसका कोई आकड़ा ही नही |
ग्रामीण स्तर पर भले ही महिलाये ग्राम प्रधान बन गयी हो जो मात्र सैद्धन्तिक आधार को प्रदर्शित करता है वास्तव आज भी ग्राम प्रधान के चेहरा तो महिला का होता है परन्तु वास्तव में सभी कार्य प्रधानपति के द्वारा क्रियान्वित किये जाते है |
हिन्दूधर्मशास्त्रों में कुल सोलह संस्कार जिक्र किया गया (गर्भाधान संस्कार , पुंसवन संस्कार , कर्णछेदन संस्कार , जातकर्म संस्कार आदि ) जिसमे कुछ संस्कारों में स्पष्ट रूप से लिंग आधारित भेद देखने को मिलते  इसमें  माँ (स्त्री ) के प्रति चिंता को नही प्रदर्शित किया गया है बल्कि एक स्वस्थ संतान की चाह व उनकी सुरक्षा को प्रदर्शित करते है| 
विवाह में स्त्री का व्यापारिकरण - विवाह की प्रक्रिया और महिलाओं का जीवन संघर्ष कि लेखक गीतेश कुल नोऊ लडकियों का सैंपल लिया जिसे इन्होने G1 से G10 तक नाम दे दिया उसमे पाया गया की चाहे रोजगार करने वाला लड़का हो अथवा बेरोजगार दोनों ही अपना गुस्सा लड़की को पीटकर दिखाते है शराब पीते है और लड़की को पिटते है इन्होने अपने लेख के अंतगर्त चार प्रकार की हिंसाओं का वर्णन किया है शारीरिक हिंसा , मानसिक हिंसा , मौखिक हिंसा , यौन हिंसा | 

इसके अलावा हमारे समाज में लिंग आधारित भेदभाव का सबसे बड़ा उदाहारण महिलाओं के लेकर बनी भद्दी भद्दी गालियाँ जो न सुनने में अच्छी न ही बोलने में फिर महिलाओं को महिलाओं के सामने ही भद्दे भद्दी गलियां दी जाति है माँ को लगाकर , बहन को लगाकर और हमारा समाज उसे सहजता से स्वीकार भी करता है |
कही न कही विवाह ने नारी को सम्पत्ति के रूप में निरुपित करने का कार्य किया है इससे महिलाये क्रय -विक्रय की वस्तु बन गयी आज भी बहुत से ऐसा राज्य है जहाँ विवाह महिला हिंसा , भेद का प्रमुख कारण बना इसने तस्करी की वस्तु के रूप में महिलाओं को दिखने का कार्य किया है | 
  विवाह ने महिलाओं को वैधानिक वैश्यावृति को जामा पहनाने का कार्य किया है |

यू० एन० बिजनस फोरम में छपे एक लेख लैंगिक समानता : महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण लेख के मुताबिक भारत में महिलाओं की भारत की जीडीपी दर में 17% भागीदारी है वही विश्व पुरे में औसतन ३७ % बताया गया है इस लेख में ये भी बताया गया की आईएफएम को आधार बनाकर ये बताया गया की यदि महिलाये भेदभाव न किया जाय तो देश की कुल जीडीपी में २७ % कि बढोत्तरी २०२५ तक देखी जा सकती है | 
निष्कर्ष :

उपयुक्त विवरणों से यह स्पष्ट हो जाता है भारतीय समाज में अभी समाजिक न्याय कोशो दूर है आज भी महिला की स्थिति समाज सोचनीय है भले ही महिलाओं ने पुरुषो के समान सभी क्षेत्रों में बढ़ चढ़कर  हिस्सा लिया हो चाहे सैनिक शासन से जुड़ा हो , शिक्षा से जुड़ा हो , व्यापार से जुड़ा हो , अर्थ से जुड़ा हो , राजनैतिक क्षेत्रों से जुड़ा हर क्षेत्र में अब महिलाये देखने को मिल जाएगी परन्तु आज भी ,महिलाओ का उनके अनुपात में उचित प्रतिनिधित्व नही है  महिलाये कुल आबादी  का इस समय लगभग ५० % है फिर भी निति निर्माण से नीति क्रियान्वयन या नीति में महिला प्रतिनिधित्व दम तोड़ रहा है |भारतीय समाज के उच्चे तबके की महिलाये भले ही ज्यादातर क्षेत्रो में कधे से कन्धा मिलकर कम करते हुवे या उनका प्रतिनिधित्व देखने को मिल जायेगा परन्तु भारतीय समाज निचे तबके की महिलाओं की स्थिति आज भी समाज में सोचनी है |जैसा की कौशल्या बैसंती ने  अपनी पुस्तक दोहरे अभिशाप में स्पष्ट किया है ठीक वही स्थिति आज भी समाज में बनी हुई एक भेद भाव महिला महिला होने के नाते सहन करती है तो दूसरा नीची जाति के होने के कारण |

लेखक :  ये लेखक के निजी विचार है इसे अन्यथा न ले , अपनी बातो को सही सिद्ध करने के लिए कुछ तथ्यों अथवा आकड़ों का जरुर सहारा लिया गया है , जिसके लिए कुछ विद्वानों के विचार , न्यूज़ पेपर , लेख , रिपोर्ट , पुस्तक , पत्रिका , विचार आदि का सहारा लिया गया है |आप अपने विचार इस लेख पर देने के लिए पूर्णतया स्वतंत्र है यदि कोई तथ्यात्मक त्रुटि पायी जाति है तो उसके लिए लेखक क्षमा प्रार्थी होगा उसमे संशोधन किया जायेगा |

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लेखक - शिव कुमार खरवार

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